सुनो प्रिय 
तुम कहीं भी जाकर देख लो , तुम यहीं रह जाते हो मेरे पास क्योंकि तुम कहीं जाकर भी कहीं जा नहीं पाते हो ! कभी तुम मेरी आँखों से अश्रु बनकर बरसते हो तो कभी मेरे उदास होठों पर अपना नाम लेकर आ बैठते हो ! इसीलिए तो अब मैं जब कभी तड़पती हूँ तो अपने मन को समझा देती हूँ कि कहीं तुम्हें कोई तकलीफ न हो ! तुम आराम से उन जगहों का आन्नद ले सको जहां तुम गए हो  ! ओ मेरे प्रिय मैं खुश हूँ बहुत खुश ! देखो, तुम्हारा नाम लेते ही मन कैसे सकूँ से भर गया है जैसे कोई सुखद अहसास मन को छु गया है ! बांध लिया है न जाने कैसे बंधन से तुमने या मैंने  ! 
अब तो
तुम से मैं हूँ और मुझ से तुम ! यही सच है और यही हकीकत ! तुम मेरे हो सिर्फ मेरे और मैं तुम्हारी !! बहुत सजा दी है मैंने खुद को, मार लिया पूरी तरह से, अब तो मुझे जीने का हक दे दो, हाँ प्रिय मुझे जीवन दे दो !
सीमा असीम 

Comments

Post a Comment

Popular posts from this blog

मुस्कुराना

याद