सीमा असीम
कहानी



एक सर्द दिन

जनवरी का महीना। कड़कड़ाती ठंडक। दिन रात एक समान से लगते हैं इन दिनों क्योंकि सूर्य देव के तो दर्शन ही नहीं होते कई.कई दिनों तक कभी.कभी तो पूरा महीना.ही गुजर जाता है। सूरज महाराज ऐसे अस्तॉचल में समाते कि उदय होने का नाम ही न लेते। काले बादलों से कोहरा झर.झर झरता रहता और आकाश से नाम मात्र की रोशनी भी न फूटती। ऐसे ही सर्द दिनों में एक रात जब मैं घर में अकेली थी।
     मैं रजाई लेकर दीवान पर लेटी हुई थीए टेबिल लैम्प को सिरहाने रखकर कुछ पढ़ और लिख रही थी। 

उन्हीं पलों में न जाने कैसे मेरी ऑंख लग गई। मैं निद्रा देवी की गोद में समा गई।
शायद रजाई की गरमाहट और तुम्हारी याद की तीब्रता मेरे दिलो दिमाग पर छा गई थीए जो उस समय मेरी ऑंखे खुल ही न रही थी। मैं तो नैट चलाकर तुम्हारे भेजे मेल चैक कर रही थीए\ कि न जाने कब नींद मुझे अपने आगोश में समेट ले गई।

मैं रजाई के अन्दर थीए परन्तु उस रजाई में तुम्हारी बाहों की गरमाहट महसूस करते हुएए बेफिक्र हो उस नींद का आनन्द लेने लगी।

डायरी किताबें लैपटाप और टेबिल लैम्प मेरे सिरहाने यूं ही पड़े रहे खुलें हुएए जलते हुए ही और मुझे होश ही नहीं था। मैं तो बिचर रही थी तुम्हारी बाहों में सिमट कर उस धड़कन में जो मेरा साथ पाकर तीव्रता से धड़क रहा था। जिसमें हर धड़कन के साथ मुझे अपना ही नाम सुनाई दे रहा था । उस सर्द अन्धेरी रात में भी तुम्हारी वह चौडी सी छाती मुझे निडरता का एहसास करा रही थी और मैं बिस्तर पर सब कुछ ऐसे ही बिखरा छोड़कर बिखरने लगी थी कतरा.कतरा होकर तुम्हारे नर्म गर्म आगोश में।

 अचानक मेरी ऑंख खुल गई। कुछ अकुलाहट और घबराहट के साथ।

 मैने सोंचाए कि मैं कहॉं हूँ ?  उस वक्त मैं खुद को ढूढ़ रही थी, टटोल रही थी अपने आप को व उस स्थान को जहॉं मैं लेटी हुई थी। मुझे कुछ नजर ही नहीं आ रहा था। निःतान्त अकेलापन सा लग रहा था। अभी तो तुम मेरे साथ थे, कहॉं चले गये ? अचानक मैं ऑंखें खोलकर चौड़ी करके चारों ओर नजरें घुमाकर देख रही थी किन्तु मुझे सिवाये अन्धकार के कुछ नजर ही नहीं आ रहा था। मैं घबराकर उस हाड़ कपाती सर्दी में भी पसीने से लथपथ हो गई।

यह सब क्या है ?
मैं कहॉं हूँ ?
जहॉं अॅंधेरे के सिवाये कुछ भी नजर नहीं आ रहा है।

तभी उस सुनसान से माहौल में बिखरे पड़े सन्नाटे को तोड़ती हुई अलार्म घड़ी ने अपनी मधुर ध्वनि मेरे कानों में घोल दी। मैं समझ गई कि मैं अपने कमरे में ही हूँ । मैं निःश्चल और शान्त होकर उस ध्वनि की चाहत में पड़ी थी जब घड़ी के घंटे बजेंगे और मुझे बतायेंगे कि इस समय कितना बजा है  तभी एक.एक कर उस घड़ी ने तीन घंटे बजाये। अरे! तो क्या मैं चार घण्टे की सुखदए सुहानी और रोमांटिक नींद ले चुकी थी। कितनी गरमाहट थी उस आगोश मेंए जो इस रजाई में नहीं है। मैं एकदम से ठंडक के अहसास से भर गई।
मैंने आसपास के माहौल को टटोला मैं तो पढ़ रही थी, लैपटाप पर नैट चलाकर कुछ लिख भी तो रही थी। अरे हॉं! याद आया मेरा टेबिल लैम्प भी जल रहा था। और मेरा मोबाइल वह भी पास में ही रखा हुआ था कि कहीं तुम्हारा गुड नाइट विश करने का कोई मैसेज या फोन न आ जाये। वह सब कहॉं चला गया मुझे कुछ नजर क्यों नहीं आ रहा !

क्या मैं वास्तव में देख नहीं पा रही हूँ ?
उस प्रकार से ही जिस प्रकार मैं तुम्हारे प्रेम में अन्धी हो गई हूँ !

 एकदम अंधी और उस प्रेम में निरंतर डूबती ही जा रही हूँ गहरे ही गहरे सागर की अनंत गहराईयों की तरह। बिना आगाए पीछे सोंचे। कुछ परवाह ही कब है मुझे अब
 किसी भी अंजाम की।

अरे! मेरी इन ऑंखों को क्या हुआ जो जलती हुई रोशनी को भी नहीं देख पा रही हैं। टेबिल लैम्प तो जल ही रही थी न फिर यह सब क्या हुआ मैं फिर सोचने लगती हॅूं।

कमरे में मेरे सिवाय कोई दूसरा तो है भी नहीं जिसने लाइट बन्द की हो। कोई आ भी नहीं सकता। आयेगा भी कैसेघ् मैं तो अन्दर से दरवाजा बन्द करके लेटी थी।

मैंने अपने हाथ को बढ़ाकर टटोलना चाहा तो पाया वहॉं तो सब कुछ वैसे ही फैला पड़ा हुआ हैए जिस प्रकार मैं छांड़कर सो गई थी। सामान तो सब वैसे ही रखा हुआ था किन्तु नजर कुछ नहीं आ रहा था। क्या लाइट चली गई लेकिन टेबिल लैम्प तो लाइट जाने के बाद इन्वर्टर से भी जलती रहती है आज वह क्यों नही जल रही
मैं हाथ बढ़ाकर मोबाइल को उठाती हूँ और उसे ऑन करती हॅू ताकि उसकी मन्द सी रोशनी में ही उठकर देखूँ  कि क्या बात है ?


परन्तु यह क्या ?

यह मोबाइल ऑन ही नहीं हो रहा हैए क्या इसकी बैट्री भी डिस्चार्ज हो गई।

इन्हीं सब चिन्ताओं में डूबकर मैंने अपनी ऑंखें बन्द कर लीं और रजाई के अन्दर मुंह घुसा लिया। बाकी की रात इसी तरह चिन्ताग्रस्त हो गुजार दी। जब घड़ी ने सात बजे के अलार्म के साथए सात घण्टे बजाये तो मैं उठकर बाहर को निकल आई।

हालॉंकि इन कोहरे भरे दिनों में दिन और रात में कुछ खास अन्तर नहीं होताए फिर भी सुबह तो हुई ही थी आस की किरण तो फूटी ही थी भले ही सूर्य की किरणें आसमान से धरती पर ना उतरी हों।

गर्मियों में जहॉं सुबह पॉंच बजे से ही चहल.पहल शुरू हो जाती हैए और लोग अपनी दिनचर्या में लग जाते हैं वहीं सर्दियों में खासतौर से जनवरी के महीनें में सात बजे तो कोई रजाई से बाहर अपना मुंह भी नही निकालना चाहता है बिस्तर छोड़ना तो दूर की बात है और कमरे से बाहर निकलने के लिए तो बहुत हिम्मत जुटानी होती है। नौ तो यूं ही बज जाते हैंए लोगों को अपनी दिनचर्या शुरू करने में। इतनी सर्दी में हाथ पॉंव चलते ही कब हैं जाम से हो जाते हैं।

जब पन्द्रह दिनों से सूरज ही न निकला हो तो फिर लोगों का क्या हाल होगा ब्लोअर और अंगीठी के सहारे हाथ पॉंवों में कुछ रवानगी आ जाती है। चाय कॉफी का अगर सहारा न हो तो शरीर ही न चले।
खैर मैं तो अपनी सारी ऊर्जा समेट कमरे से बाहर निकल आई थी। लाइट चैक की पर यह क्या  ? बिजली गुल ,सर्दियों मे भी लाइट का यह हाल है तो गर्मियों में क्या होगा इतनी सर्दी में बिजली का जाना समझ नहीं आता।

मैंने जल्दी से इन्वर्टर चैक किया। वह डिस्चार्ज हो चुका था। अब तो हाथ पर हाथ धरकर बिजली के आने का इन्तजार करने के सिवाय कोई उपाय ही नहीं सूझ रहा थाए क्योंकि सब कुछ चार्ज तो बिजली के आने पर ही होगा। बिना कुछ भी चार्ज किये न तो तुमसे बात हो पायेगी और न ही चैट मैसेज भी तो नहीं कर पाऊॅंगी।

मैं घबरा उठी बेचैनी से भर गई। वह तो मेरा इन्तजार कर रहे होंगें। मेरे गुड मॉर्निंग मैसेज का।

क्या करूँ ?

कैसे करूँ ?

कुछ समझ ही नहीं पा रही थी। घर में कोई दूसरा भी तो नहींए जो मेरी समस्या सुलझाने में कुछ मदद करता। खैर मैं बार.बार लाइट चैक करतीए कभी मोबाइल को उठाकर ऑंन.ऑफ करती। बैट्री निकाल कर देखती कि शायद कुछ मिनट को ही चल जाये। इन्वर्टर का बटन बार.बार दबाकर देखती कि शायद वह ही कुछ देर को आन हो जाये, तो मोबाइल चार्ज कर लूॅं, एक मैसेज करने भर को ही सही।

पर कहॉं ?  कुछ भी तो संभव नहीं हो पा रहा था, सब असंभव ही जान पड़ रहा था। आसमान में छाये कुहासे की तरह मन में भी गहन अन्धकार भर रहा था। खुद से ज्यादा चिन्ता तो उनकी हो रही थी। मैं उनकी परेशानी में घुल रही थी, तो वे कितना परेशान हो रहे होंगेए न जाने क्या कर रहे होंगे ? पता नहीं चाय भी पी होगी या नहीं। नाश्ता भी किया होगा या नहीं ?

नाश्ता शायद  तो क्या ? वास्तव में नही किया होगा। ऐसे ही चिन्ता में बैठे होंगे। अब तो लंच का समय भी होने को आया। कैसे खायेंगें ? मेरे से बात किये बिना वे कुछ भी।

न जाने कितनी बार फोन मिलाया होगा, मोबाइल बन्द पाकर घबरा रहे होंगें फिर कितने ही मैसेजए वॉइस कॉल और मेल भेज दिये होंगे। अब मैं खुद से ज्यादा उन्हें समझने लगी थीए वैसे मैं खुद को भी कहॉं समझती थी अब तक जब से तुम्हें जाना पहचाना तब से ही कुछ.कुछ खुद को पहचानने लगी थी, या फिर जानने समझने की कोशिश करने लगी थी। लेकिन तुम्हें जान कर ही तो जाना था खुद को। फिर सोचती कितनी पागल हूँ मैं ! कहीं ऐसा भी होता है ! वे जरूरी काम से गये हैं ! काम निबटाने में लगे होंगे ! ना कि मेरी तरह हाथ पर हाथ धर कर मुझे ही याद करने में लगे होंगे।

लेकिन मेरा मन वह भला कहॉ मानने वाला क्योंकि इसमें तुम इस कदर समा गये होए जहॉं सिर्फ तुम ही तुम तो हो, वहॉं तुम्हारा ही बसेरा है। अब मेरी सांचने समझने की शक्ति खोने लगी थी।

मेरे बायें अंग जितनी तेजी से फड़क रहे थे, उतनी ही बेसब्री से मेरी धड़कनें बढ़ती जा रही थी। मैं घबराहट में उठ कर इधर उधर टहलने लगी। मैं कितना असहाय महसूस कर रही थी आज अपने आप को। इस दुरूह स्थिति में तो कभी भी नहीं आई थी। ऐसी सिचुऐशन तो कभी नहीं होती, न ही कभी सामना ही हुआ था, इतनी परेशानियों से एक साथ।

जितना मन को समझाने की कोशिश करती।

    धैर्य!    धैर्य!    धैर्य!



 सब कुछ ठीक होने ही वाला है। जो देर हो रही हैए सो हो रही है। जो समय जा रहा है वह जा रहा है बस। हमेशा थोड़े ही रहने वाला है यह सब। वक्त बदलता है। समय अपनी रफ्तार से चलता रहता है। अच्छे बुरे सही या गलत का भान कराता चलता है।

यह समय भी अब जाने ही वाला है, अच्छे समय को लाकर। जो बुरे समय को मिटा देगाए हमेशा के लिए। भले ही थोड़ी सी देर है, पर अंधेर नही।

अय  मन थोड़ा तो धीर धरो।

 बस अब गया ही समझो यह समय।  शायद मन कुछ समझ जाये इस तरह समझाने से परन्तु शायद क्या बिल्कुल भी नहीं समझा।

इस तरह कहॉं समझता है मन, यह मन भी बड़ा मन का होता है, जब उसका मन करे, तो सब ठीक, पर मेरे कहने समझाने का उसे क्या फर्क पड़ता है।

यह विरह वेदना तो वही समझ सकता है, जिसने झेली होगी या झेल रहा होगा, दूसरा क्या जाने, जिसने इसे न जाना न समझा। मुझे शिददत से वह कहावत याद आ गयी
वो  क्या जाने पीर पराई जिसके पैर न पड़ी विबाई।

कितनी असहनीय पीड़ा होती है। इस तरह प्रेम में विरह की। यह आज ही जान व समझ पाई थी। हर तरह से मन को समझाकर भी मन को न समझा पा रही थी।
अब ऑंखों से बेतहाशा ऑंसू बहने लगे थे। जब हम बेहद असहज, असहाय हो जाते हैं, तो यह ऑंसू किस प्रकार हमारा सहारा बनकर हमारा संबल बॅंधा देते हैं। अकेलेपन के अहसास को दूर कर देते हैं। और पीड़ा को ऑंसूओं के रूप में बहा देते हैं। बहुत ताकत होती है इन आंसुओं में, इनकी कीमत तो वही समझ सकता है जो इनका साथ पाता है। कुछ पल को ही सही, सहज तो महसूस कर लेता है अपने आप को। जिन्होंने इन्हें सिर्फ ऑंसू न समझए एक सच्चा साथी समझा होगाए वे कुछ हद तक धीर बॅंधा ही लेते होगे अपने मन को, भले ही कुछ पल को ही सही, उस जान ले लेती विरह वेदना से थोडी राहत तो पा ही लेते होगे।

दुःख की घड़ियों में जब हमारे अपने भी साथ छोड़ जाते हैं, तो यह ऑंसू ही हमारे सच्चे साथी होते हैं और तब तक साथ निभाते हैं, जब तक दुःख की घड़ी छट नहीं जाती। गुजर नहीं जाते वे पल, जो हमें दुःसह दुख की काली घटाओं में कैद कर देते हैं। सब कुछ धोकर मिटा करए उस बदरंग बदरी से निजात दिला कर उज्जवल साफ और निखरा हुआ कर देते हैंए फिर हम खुशी से चहक उठते हैं और हॅंसी हमारा साथ देने को आतुर हो उठती है।

परन्तु आज इतना रोने के बाद भी मन शान्त नहीं हो रहा था। बेचैनी बढ़ती ही जा रही थी और मुझे अब सांस लेने में तकलीफ होने लगी थीए दम घुटता हुआ सा लग रहा था। मैंने उठकर सब दरवाजे खिड़कियॉं खोल दीं थी। थोड़ी सी ताजी हवा का झोंका पाने को खिड़की से सटकर खड़ी हो गई। किन्तु सर्दियों में कभी.कभी हवा का रूख भी सख्त और बेरहम हो जाता है। बर्दाश्त के बाहर होती घुटनए मेरी मांसपेशियों में अकड़न पैदा करने लगी थी और दिमाग की नसें तनी हुई सी लग रही थी। लगा अब अगर एक पल भी इस माहौल में रही तो मेरा अन्त निश्चित है।

ऐसा सांचते हुए मैंने अपने को कुछ संयत करने का यत्न किया किन्तु सब व्यर्थ। मैं ऐसे ही दरवाजा खोल बाहर निकल पड़ी, उन्हीं रात के कपड़ों में चलती हुई बाहर सड़क पर बनी जेब्रा क्रासिंग को पार करके सड़क के दूसरी ओर आ गई। फुटपाथ पर कदम रखने को भी जगह नहीं थी। पूरा फुटपाथ सामान बेचने वालों से भरा हुआ था। वे आवाजें लगा लगाकर सामान को बेचने की जद्दोजहद में लगे हुए थे। मुंगफली, फल, चाट, पकौड़ी के ठेले भी आस पास लगे हुए थे। इन सबके शोर शराबे के बीच सड़क पर चलती कारेंए बसेंए बाइकें व ऑटों के हार्न की आवाजें मेरे विचलित मन को जरा भी ध्यान भग्न नहीं कर सकी थीं।

मैं तो इन सब से बेखबर अपनी ही धुन में चली आ रही थी। ऐसे में मुझे वह पल अचानक से याद आ गये। जब मेरी परेशानी को देख तुम आगे बढ़कर अपनी बाहों में समेट कर मेरे माथे पर चुम्बन जड़ देते थे। वह चुम्बन मेरी सारी तकलीफों, परेशानियों को पलभर में ही दूर कर देता था।

औरत मर्द का इंसानी रिश्ता ही तो आखिर इस दुनिया का सबसे बड़ा सच है। इसके अलावा तो सब झूठ हैं, छल है।

इन्हीं विचारों के झंझावतों से जूझते हुए न जाने कैसे मैं एक इन्टरनेट कैफे के सामने आ खड़ी हुई पता ही न चला। वहॉं पर धड़धड़ाते जैनरेटर के शोर से मेरी तन्द्रा भंग हुई। तब मेरी निगाह सामने लगी दीवार घड़ी पर चली गई, दोपहर का तीन बज रहा था। इस मौसम में कब सुबह, दोपहर में तब्दील हो जाती है, इसका पता तो समय देखकर ही चल पाता है, अन्यथा तो कुछ पता ही न चले दिन और रात का।

वैसे भी इन सर्द दिनां में पता ही कब चलते हैं।
      सुबह, दोपहर, शाम, रात।

सब ढ़लते चले जाते हैं। वैसे भी जबसे तुम गये हो तब से सिर्फ एक याद के सहारे ही तो कट रहे हैं यह दिन।

 उफ! यह दूरी भी कभी कभी कितनी दुःखदाई हो जाती है।

ऐसे ही यंत्र चालित सी मैं एक कम्प्यूटर के सामने जाकर बैठ गई। अपनी आई डी डालने को जैसे ही की बोर्ड पर बटन दबाने चाहें कि मुझे ध्यान आया कि यहॉं इतने लोग हैं। ऐसे में क्या पता, उनका कोई पर्सनल मैसेज आया हो, तो कैसे पढ़ पाऊॅंगी, यहॉं पर इन सब लोगों के सामने। यह सोंच मैने कम्प्यूटर बन्द करने को माउस का बटन क्लिक ही किया था कि वहीं पर खड़ा लड़का बोल पड़ा, मैडम आप  ऑन ही रहने दें, मैं काम करूँगा इस सैट पर।

 मेरे हटते ही वह उस पर बैठ गया था। मेरा तो इस ओर ध्यान ही नही गया था, कि पीछे भी कोई खड़ा हुआ है। मैने सोंचाए चलो अच्छा ही हुआ, जो मैने अपनी आई डी न खोली।

अभी भी रह.रह कर बस उनका ही ख्याल आ रहा था। क्या वह भी इतने ही बेचैन होंगे ? क्या वह भी इतना ही परेशान हो रहे होंगे ?  हॉं शायद!

क्योंकि दिल  से दिल को राह होती है।

लेकिन उनके पास और भी तो ढ़ेरों काम होंगे करने को फिर भी मेरी चिन्ता तो कर ही रहे होंगें।


वैसे देखा जाये तो एक औरत और मर्द के प्यार में बहुत अन्तर होता है। मर्द प्यार तो करता है लेकिन कहीं न कहीं उसके प्यार में देह शामिल हो जाती है और एक नारी वह तो सच्चे दिल से पूरे मन से प्यार करती है।

सागर की अतल गहराइयों में डूबते हुए सिर्फ और सिर्फ प्यार ही प्यार। उसकी नजरों में रूहानी प्यार ही सच्चा प्यार होता है। शारीरिक प्यार तो मात्र आकर्षण होता है। जो चिरकाल तक कहॉं जीवित रह पाता है जबकि रूहानी प्यार  वह तो जन्म जंमान्तरों तक जीवित रहता है, उसकी मौत ही कब होती है। वह तो हर जन्म में एक नये रूप में अवतरित हो जाता है। हॉं यह अलग बात है, प्यार के चरम में जिस्मों का शामिल हो जाना उस प्रेम की मान मर्यादा को बढ़ा देने के समान होता है, क्योंकि तब वह प्रेम की परकाष्ठा होती है और फिर वह असीमित हो जाता है, सीमाओं और रेखाओं से परे।

इसी उधेड़बुन में चलती हुई घर के दरवाजे पर आ खड़ी हुई। दरवाजा खोलकर अन्दर आई। शाम का धुंघलका गहरा गया था और मैं पूरा दिन ही सड़कों पर बेवजह घूमकरए भटक कर गुजार आई थीए फिर भी मन की चिन्ताए फिक्र, उलझन और परेशानी जस की तस बनी हुई थीए उसमें तो नाम मात्र का भी परिवर्तन नहीं हुआ था। मैं दर्द के अथाह सागर की गहराइयों में डूबतेए उतराते हुए गोते लगा रही थी। जो पीड़ा मैं झेल रही थी, उसे शब्दों में वर्णित करना तो पूर्णतया असम्भव ही जान पड़ता था कि उन्हीं क्षणों में मैं अपने अन्त का विचार करने लगी थी। तभी किसी शायर की वह नज्म याद आ गई ......

मरने वाले तो बेबस हैं जीने वाले कमाल करते हैं

तब मैंने निश्चय कर लिया कि मैं जिऊॅंगी मुझे जीना होगा तुम्हारे लिए, सिर्फ तुम्हारे लिए।

यह अंधेरा तो क्षणिक है। पल भर में छट जायेगा, कुछ ही देर में घर जगमगा उठेगा और घर के रौशन होने के साथ ही मन भी रौशन हो जायेगा चमक जायेगा, खिल उठेगा और एक खुशबू सी बिखर जायेगी, चारो ओर। मैं अनायास ही सकारात्मक विचारों से भर गई, मेरे मन की नकारात्मक भावना पल भर में ही न जाने किधर विलुप्त हो गई। जिस मन को सुबह से समझाने में नाकामयाब हो रही थी, वही मन पल भर में ही न जाने कैसे मान गया था।

मैं कंबल लपेटकर सोफे पर बैठ गई और कैण्डिल की हल्की.हल्की सी रोशनी से जगमगाता वह कोना, जो प्रकाश से भरा हुआ था देख रही थी। ठीक उसी प्रकार मेरे मन में भी एक आशा की किरण जाग्रत हो उठी थी। लग रहा था कि अब तो लाईट बस आने ही वाली है। सोफे पर लेटते ही अचानक मेरी पलकें बन्द हो गई और मेरी ऑंख लग गयी। रात भर न सो पाने के कारण और दिन भर व्यर्थ भटकने के कारण, थकान मुझ पर हावी हो गयी थी। मैं निद्रा देवी की गोद में समा चुकी थी कि अलार्म घड़ी ने तीन घण्टों की ध्वनि बिखेरी मैं
हड़बड़ाकर उठ बैठी।

देखा पूरा घर दूधिया रौशनी से जगमगा रहा था। मैने जल्दी से उठकर सब कुछ चार्जिंग पर लगा दिया। पूरा दिन गुजर चुका था संवादविहीन। जैसे ही सकारात्मक विचार मन में आयेए तो मन खुश हो गया और सब सम्भव होता चला गया। पल भर में ही वह खुशियॉं हमें वापस मिल गयींए जिसके लिए मैं पूरा दिन भटकती रही। अब मैंने उन खुशियों को अपने दामन में समेटने की तैयारी कर ली थीए जो पिछले चौबीस घंटे के लिए मुझसे रूठ गयी थीं। संवाद स्थापित करने को आतुर हो, मैने सब कुछ ऑन कर दिया था। उसी समय दरवाजे पर किसी ने घ्ांटी बजाईए यह कौन आया है इस समय ?
 मैने दरवाजे की सिटकनी बडी हिम्मत करके खोली, सामने उनको आया देख, अपनी बाहें फैलाकर उनके गले से लग गयी। नम हो आयी ऑंखों के साथ यह कहते हुए कि अरे आप आ गये?
मैं गया ही कब था पूरे जमाने का प्यार ऑंखों में भरते हुए हौले से उन्होनें मेरे बालों को सहला दिया ।







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