दर्द रिसता है
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सावन का महीना
रिमझिम बरसते बादल
रिसते रहते हैं बूंद बूंद
कभी दिन भर कभी रात भर
सुनो प्रिय, लम्हा लम्हा उदास है
प्रेम शिखर पर बैठी मैं
आँचल मे दिया जलाए
मिटा लिया खुद को ही
भूल गयी अपना स्व
कितने शिकवे शिकायते
सब दरकिनार कर दिये
हर पल मे लिखती रही
प्रेम की नई इबारत
बिना किसी वादे, वफा
जन्म जन्मांतर तक निभाते हुए
धड़कते हुए दिल की हर धड़कन के साथ
लेती रहूँगी सिर्फ तुम्हारा नाम
रोम रोम से निकलती दर्द भरी आह
बेचैनी से भरा मन
कितना उदास है
क्या तुम भूल गए
या तुम भी यूं ही उदास हो
अपने वादे को याद कर कर के
जाने अंजाने में !!
@सीमा असीम

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