गतांक से आगे 
रिया तू मुस्करा 




जब कभी सोचती हूँ, तो बस सोचती ही रह जाती हूँ, इतना ज्यादा दर्द में डूब जाती हूँ कि कहना मुश्किल लगने लगता है ! क्या आज इंसान सचमुच ऐसा ही हो गया है ? हैरत सी होती है कितनी परतें होती हैं, प्याज़ के छिलके की तरह परत दर परत !!
सच में इस दर्द से कोई भी राहत नहीं किसी भी तरह से ! मैं तुम्हें नहीं बदल सकती लेकिन मैं तुम्हारा यह रूप भी नहीं देख सकती इसीलिए छोड़ दिया सबकुछ ! 
मुझे यह भी पता है कि तुम्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि तुम अपनी सोच को सही समझते हो ! जबकि तुम नहीं जानते तुम्हारी यही सोच एक दिन तुम्हें डूबा देगी ....मैं मानती हूँ कि सबके अपने अपने विचार होते हैं भावनाएं होती हैं .........लेकिन कभी किसी दूसरे की भावनाओं की कदर करना भी सीखो उसके मन को भी समझो ......जिसने अपना जीवन ही तुम्हें सौप दिया तुमने उसे मौत दे दी ....खत्म कर दिया ...पूरी तरह से मिटा दिया .....मार दिया उसे जीते जी ..... कैसे ? आखिर कैसे ? क्या .......

जब्त कहता है खामोशी से बसर हो जाए तो अच्छा 
पर दर्द इतना है कि फूट पड़ता है .....

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