बस सच की एक मोहर लगा दो क्यों कि हर काया में माया का डेरा है और मोह-ममता का बसेरा है सच की मोहर लगते ही तुम्हारा प्रेम स्वरूप अनंत हो जाएगा तुम्हारा रोम रोम संत हो जाएगा रहस्य का पर्दा खुल जाएगा तुम्हारा शरीर मंदिर बन जाएगा तुम्हारा संत ह्रदय महंत हो जाएगा तू त्रिगुणी माया से परे पंचतत्त्व से दूर मन-बुद्धि-वाणी से परे व्यापक और भरपूर हो जाएगा!
 प्रेम-प्रेम सब कोई कहे
 पर प्रेम न जाने कोई
यह केवल अनुभव का विषय है न कि कहने व सुनने का, प्रेम का अनुभव तभी हो सकता है जब मन स्थिर होकर अंदर की ओर मुड़े तो प्रेम का वृक्ष बिना धरती व बिना बीज के ऊगता व फैलता है !
रूहानी प्रेम का आधार संसार तथा विषय-विकार नहीं है प्रेम एक ऐसा दिव्य वृक्ष है जिसमें आत्मिक आनंद के अनगिनत ज्योतिर्मय फल लगे हैं प्रेम तो बसंत है फागुन मास की पुरवाई है प्रेम ही ध्यान में अंदर उतरने या परब्रह्म को पहिचानने का आध्यात्मिक राजपथ है प्रेम तो अनुग्रह त्याग समर्पण तथा
’पूर्णमदः-पूर्णमिदं’ की सही व्याख्या है मेरी दृष्टि में प्रेम एक श्रद्धा है.
जीवन की संपूर्णता है,
 स्वर्ण कलम से लिखा हुआ सौभाग्य है
 जीवन के आनंद का उत्सव है
हजारों में से किसी एक हृदय में इस प्रेम का झरना फूटता है
 ऐसे भाग्यशाली का रोम-रोम थिरकने लगता है
शरीर का प्रत्येक अणु रोम रोम प्यार की तरंगों में समा जाने को मचलने लगता है
और सही मायने मे जीवन का अर्थ वही समझ सकता है जिसके अंदर प्रेम जागृत हुआ है यह एक अपूर्व सफलता परम सिद्धि तथा पूर्णब्रह्म से पूर्णतः साक्षात्कार करने की प्रक्रिया है लेकिन याद रखना हम सबकी की धुरि है प्रेम रस
खिड़कियों से भीतर आने वाली धूप नहीं है, खिड़कियों पर जमी धूल है प्रेम दरवाजों का खुलना नहीं, दरवाजों पर किसी के आने की आहट है प्रेम
  प्रेम न देना है , न लेना है, बरसना है और बरसते ही चले जाना है !! न पिंजरा है न खुला आसमान, न अक्ल न दिल, न छिपाना न दिखाना न मुमकिन न ही नामुमकिन इश्क नूर है जो कायम है सदा रोशनी में भी और अंधेरों में भी
न इसकी खुद की रोशनी, न खुद का वजूद ये उनके पास है जो सूरज की तरह खुद में रोशन हैं पूरी दुनिया में इस बात का शोर है कि हर सांस लेने वाली रचना किसी न किसी के प्यार में है कोई प्यार में आबाद है तो कोई गम की गलियों में इश्क की पनाह ढूंढ रहा है, पर सच तो यह है दोस्तों कि प्यार बाहर की बात ही नहीं
प्यार सांस है, जो भीतर रमती है एक बार सांस बाहर हुई कि सारा किस्सा खत्म प्रेम वो कस्तूरी है, जो हमारे भीतर छिपी है और उसकी सुगंध के पीछे हम पूरे जंगल के चक्कर लगा रहे हैं यह खारा पानी है इससे प्यास नहीं बुझती यह तो सफेद रेत है जिससे आत्मा की सारी मैल छूट जानी है भगवान् ने स्वयं कहा है ... भगवन उवाच -अहमे वास में वाग्रे नान्यद यतसद्सत्परम ।
पश्चाद हं यदे तच्च यो वशिश्येतसो स्म्यहम ।
ऋइतेर्थ यत प्रतियेत न प्रतियेत चात्मनि ।
ताद्विदात्मानोमाया यथाभासो यथा तमः ।
यथा महान्ति भूतानिभुतेशुच्चाव चेश्वनु ।
प्रविष्त्तान्य प्रविश्त्तानी तथा तेषु न तेश्वहम ।
एतावदेव जिग्यासं तत्व जिज्ञासु नात्मन :।
अन्व्याब्यातिरेका भ्याम यत स्यात सर्वत्र सर्वदा ।



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