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जो मैं लिखती हूँ प्रेम
तुम आकर पढ़ लेते हो
मानो छू देते हो चुपके से मुझे
एक अजीब सी सिहरन
धमनियों में दौड़ जाती है
कामनाओं के तार छिड़ जाते हैं
सुनो प्रिय मैं तुम्हारी उस अनछुई छुअन को
पल पल महसूस करती हूँ
मेरी आँखों से बहते प्रेम अश्रु
मेरे मन को विचलित करते हैं
माना कि प्रिय का साथ ही सबकुछ है
प्किंतु जीवन के अपने प्रतिबंध हैं
सब जानती हूँ
फ़िर भी चाहती हूँ एक वादा
कि जब तक कायम है सृष्टि
और तुम कहीं भी रहो
मेरे प्रेम को यूँ ही महसूस करते रहना
बिना छुअन
बिना मिलन
मेरे प्रेम को जीते रहना और
मेरा इंतज़ार न टूटे कभी प्रिय यह नश्वर संसार है और शरीर छनभंगुर
लेकिन
मन से जुड़े तार
कहाँ टूटते हैं कभी
इसलिए
तुम कहीं दूर जाकर भी
कभी भी दूर नहीं जा पाओगे हमसे .! !
सीमा असीम

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