निस्वार्थ स्नेहसिक्त प्रेम में


न जाने क्यों हर पल हर घडी

इंतजार करती है

न जाने किस सोच में रहती है

कि घिर आते हैं बादल बरसने को

फिर बरसते ही रहते हैं आँखों से

दिन रात कभी न थमने को

इतना व्यथित मन

व्याकुल होकर घबरा जाता है

बार बार हर बार

उस आसमां के इंतजार में

जो मगन है अपनी ही दुनियां में

क्या मालूम वो भी करता होगा

उसकी ही तरह से इंतजार

देखता हो वो भी  

हर कण में उसकी छवि

शायद वो भी विचारता हो उसे

या करीब कर लेता हो अपनी सोच में

ले लेता हो आर्लिंग्न में

चूम लेता हो माथा

निहारते हुए उसके मुख को ‘

मंत्रमुग्ध हुआ जाता हो

और खिचा चला आता हो

धरा के निस्वार्थ स्नेहसिक्त प्रेम में !!

सीमा असीम 

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