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Showing posts from 2020

नवबर्ष

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 आज नव वर्ष के पहले दिन से यात्रा पर आधारित नया ब्लॉग शुरू करती हूं, घूमना किसे पसंद नहीं होता, सब को घूमना मस्ती करना इंजॉय करना कुछ पल अपने साथ बिताना दुनिया की परेशानियों से दूर चले जाना सभी को अच्छा लगता है ना लेकिन अगर  कुछ तैयारियों के साथ किया जाए तो मजा दोगुना हो जाता है न...
 बेटे किताबें पत्री पतरा छोड़ चला खेती किसानी में मन लगा कुछ ना होगा तेरे पढ़ने लिखने से मैं भी पढ़ा था पांच जमात कुछ कर पाया मैं खेती किसानी से ही पेट भरा है हमें घर पाला है एक रस्सी चलाई है तेरी मां को जेवर भी बनवा कर दी है मैंने इस किसान खेती किसानी से और देख अगर तू पड़ेगा लिखेगा तो कुछ ना कर पाएगा मैं आज तुझसे फिर बार कह रहा हूं एक बार और सुन ले देख पास पड़ोसी सब कह रहे हैं कि तू बहुत पढ़ाने में लगाया अपने बच्चे को बिगड़ जाएगा शहर चला गया तो कभी वापस भी कल रामधन का का भी मौज है समझा रहे थे कि मत पढ़ा लड़का को ज्यादा अगर पड़ गए हो तो दिमाग खराब हो जाए गोगा को शहर चलोगे तो शहर में लोहड़ी उनके पीछे भागो भागो तेरा हीरो और उल्टा सीधा कर बैठो तो तू तो अपने लोढ़ा से भी जाएगा तो बेटा मैं तुझे समझा रहा हूं कि 5 बच्चा है हमारे दिल में तू अकेला लड़का है जाल ओड़िया है उनकी तो ब्याह में गोली चली जाएंगे अपने घर तुझे 5 बीघा खेती कौन देखेगा  आज फिर पिताजी वही सब बातें तोहरा रहे थे जो कल भी उससे कही थी अब क्या करें उसे समझ ही नहीं आ रहा कि अब क्या करें कैसे पढ़े माने तो अपनी जान गिरवी रखकर...

कहानी

दर्द इतना ज्यादा आंखों के आंसू रो कि नहीं रहे जितना रोकने की कोशिश करो उतना ही ज्यादा प्यार है मनु है ऐसा लगता जैसे कि कोई कलेजा खींच के लिए चला जा रहा है मैं आपको कितनी चोट पर चाहिए सीने पर जोर जोर से मारा सर के बाल पूरी तरह से खींच ली है परेशान क्यों कर के अपना गला दबा दें करके कोशिश की जवानी के लेकिन सुबह जा रहे थे जा रहे हो आज का नहीं है कई सालों से लगाता है चलना है क्यों जैसे सच्चे दिल से अपना समझती वही उसे दगाबाजी कर रहा था झूठ बोलनालना सफाई देना उसका शक्ल बन गया था की नजरों में किसी औरत की कोई इज्जत ही नहीं जिसको भी तो उससे उससे ही बात करता हूं अपने शब्दों से उसका हंगामा कर देता हैरत होती थी ठीक है सा कैसे होता है कोई आदमी जो दिल से हमको छोड़ना तन मन धन से बर्बाद करके औरत का मस्त गाना मस्त ईमान धिक्कार है धिक्कार है लानत इसे कहते हैं न जाने क्यों कोई फर्क नहीं पड़ता उस शख्स को कोई भी फर्क नहीं पड़ता पहले से ज्यादा और बहरा हो गया

सुंदर कविता

 *सुंदर कविता* जो कह दिया वह *शब्द* थे ;       जो नहीं कह सके               वो *अनुभूति* थी ।। और,       जो कहना है मगर ;            कह नहीं सकते,                    वो *मर्यादा* है ।। *बात पर गौर करना*- ---- *पत्तों* सी होती है          कई *रिश्तों की उम्र*,  आज *हरे*-------! कल *सूखे* -------! क्यों न हम,  *जड़ों* से;  रिश्ते निभाना सीखें ।। रिश्तों को निभाने के लिए,  कभी *अंधा*, कभी *गूँगा*,     और कभी *बहरा* ;             होना ही पड़ता है ।। *बरसात* गिरी    और *कानों* में इतना कह गई कि---------! *गर्मी* हमेशा          किसी की भी नहीं रहती ।। *नसीहत*,               *नर्म लहजे* में ही                 अच्छी लगती है । क्योंकि,...

इन दिनों

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 जाने क्यों मन उसकी ओर खिंचा चला जाता है जिसे ना देखा कभी, ना जाना कभी, ना समझा और न  पहचाना फिर क्यों वह मेरे मन को बांधे लिए जाता है जी करता है उसे बार-बार बात करूं  उससे पूछे उसका हाल उसके बारे में जान लूँ सब कुछ और बाँट ले आपस में अपने अपने सुख दुःख ..... और  जैसे सुबह की पहली किरण हो  तो उसको देखूं जब चांद ढलती हुई रात आए तो मैं उसको निहारुँ हरदम रहूँ आसपास यह तमन्ना यह ख्वाहिश यह आस क्यों जगी है आजकल इन दिनों मेरे तन्हा मन में.... सीमा असीम 3,12,20

सच्चे मन से

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 उनकी आपस में बात नहीं होती रोज रोज  वे आपस में मिलते भी नहीं है रोज-रोज  ना दूर होते हैं कभी भी  ना पास होते हैं कभी   फिर भी वे बातें करते हैं आपस में हर वक्त फिर भी वे आपस में मिलते हैं हर वक्त  वे दूर होते नहीं है कभी भी  वे पास पास रहते हैं हर वक्त  क्या यकीन नहीं होता है तुम्हें जरा भी  क्या तुम्हें विश्वास नहीं होता है इस बात पर   हां होगा भी भला कैसे  कभी मन को सच्चा किया ही नहीं होगा तुमने  कभी सच्चा प्यार किसी से किया ही नहीं होगा तुमने  कभी किसी के लिए दिल धड़का ही नहीं होगा तुम्हारा  कभी किसी से मिलने की चाहत भी नहीं हुई होगी तुम्हारी  ऐसा होता अगर कभी भी  तो तुम जान जाते  तो तुम समझ जाते  हर बात दिल की  हर बात मन की  कि प्रेम होता है सदा सच्चे मन से है  पवित्र मन से  कभी आजमा लेना  सब समझ जाओगे  दूर रहकर भी किसी से हर वक्त पास पाओगे  यही तो होती है सच्चे प्यार की निशानी  जो तेरा है वह सदा तेरा ही रहेगा  दूर रहे चाहे रहे पास  क...

आगे

तुम्हें भी होता होगा न

 जो दुःख जो कष्ट मेरी आत्मा को होता है  क्या तुम्हें भी होता है  जिस तरह से मेरा जिस्म बेजान हो जाता है  क्या तुम्हारा भी होता है  न सुध होती है खाने की न पीने की होती है  क्या ऐसा ही तुम्हारे साथ भी होता है  ज़ब बेतहाशा बहते हैं मेरे आँसू रुकते ही नहीं किसी तरह  तो क्या तू भी रोता होगा  भूल जाती हूँ सारी दुनिया याद रहते हो सिर्फ तुम ही  क्या तुम भी यूँ ही भूल जाते हो सब  दिन रात रटता है मेरा मन तेरा ही नाम  क्या तू भी करता है ऐसा  पल पल याद करती हूँ मैं तुझे  क्या तू भी याद करता है मुझे  ज़ब कोई आकर कहता है कि उससे मेरा मिलना जुलना  होता रहता है  तो मन विश्वास ही नहीं करता है क्योंकि तू तो मेरा है न  सिर्फ मेरा ही तो कैसे कोई तुझसे मिल सकता है  या फिर तू ही कहाँ किसी से मिलता होगा  मेरे सिवाय तुझे कोई नजर ही कहाँ आता होगा  जैसे मैं तेरे अलावा किसी को देख नहीं पाती हूँ दुनिया में  हैं न?  सीमा असीम  5, 11, 20

मन

 यह मेरा मन कभी कैसा होता है  ना जाने कितनी बातें करता है  खुद से ही कहता है सुनता है  हंसता है कभी रोता है  और कभी डूब जाता है  बहुत गहरे, गहराई में मन की   और फिर उबरना ही नहीं चाहता वहां से  उसे डूबे रहने में ही सुख मिलता है   बाहर आते ही दुखी उदास हताश निराश हो जाता है  ना जाने क्या चाहता है मन  कुछ चाहता है तुमसे  अनोखा सा पर   तुम मिल तो सकते हो   लेकिन थोड़ी देर के लिए  कुछ समय के लिए  और फिर बिछड़ जाते हो   बिना किसी बादे के बिना किसी कसम के रस्म के  ना जाने कब मिलने के लिए  ना जाने कब साथ उठने बैठने खाने पीने के लिए  सोचता ही नहीं है मन  समझता ही नहीं है मन  बेकाबू सा बेचैन सा  भागा चला जाता है  खिंचा चला जाता है  उसकी तरफ़ उस ओर   जिधर कोई परवाह ही नहीं  कोई फिक्र ही नहीं  कोई इंतजार ही नहीं  या खामोशियों में लिपटे  गरम एहसासों की तरह  लपेट लेता है मन को मेरे  कभी ना दूर जाने देने के लिए...

सनम हरजाई

 कैसी जमी है थोड़ी सी नमी है छल छल छलकती है बरसात आंखों से  एक तेरी कमी है यह तेरी कमी है ज़ब यादों का बबंडर सीने में उठता है  दिल फिर किसी हाल नहीं संभलता है  तू हरदम साथ होने का अहसास देता है  तो मन क्यों मेरा इतना मचलता है  तू लग जाये आकर मेरे गले से  हर शय से बस यह दिल दुआ करता है  पोछ देना मेरे बह बह कर सूखे हूए आँसू  लेकिन यह बता तू क्यों इतनी सजा देता है  मेरे मर्ज़ को बढ़ाकर तू मुझे मार देता है  सनम कहूं तुझे या हरजाई कह दूँ  बनाता ही क्यों है ज़ब बार बार मिटा देता है...  सीमा असीम  21, 10, 20
  कोरोना वायरस के कारण देश की अर्थ व्यवस्था लड़खड़ा गयी थी। लग रहा था कि अपना  विकासशील देश लुढ़ककर अविकसित देश की गोद में जा बैठेगा। सरकार परेशान थीं।  ज्यादातर राज्य की सरकारों ने फल/सब्जी/केमिस्ट और पंसारी की दुकानें खुलवा रखी थीं। लेकिन अर्थ व्यवस्था की डूबती नैया को इन तिनकों से उबारना अब मुश्किल लग रहा था।  अचानक सरकार को जाने क्या सूझी! उसने नशेडिय़ों के सिर पर देश की अर्थ व्यवस्था का भार लादने की ठान ली।   शराब प्रेमियों ने अपने कर्तव्य का पालन करते हुए अर्थ व्यवस्था को अपने कंघे पर मजबूती से धरा और आगा-पीछा देखे बिना ही दौड़ पड़े।  लड़खड़ाकर यहाँ - वहाँ गिरे / पड़े, शौकीन और बेसुध लोग सच्ची मायने में बैसाखी साबित हुए।

अपना सा

 जब उससे बार-बार बात करने को जी चाहे  जब वह बात करे तो हमें गुस्सा आ जाए  जब बात ना करें तो मेरा दिल घबराए  कैसे अनजान से रिश्ते में मन बंधा बंधा जाए  दूर कोई चमकता सितारा आपके मन में समा जाये   कभी मुस्कुराने को जी चाहे, कभी मिलने को  अंजाना कोई, अपना सा लगने लग जाए  सच में कुछ समझ में ना आए कभी समझ में ना आए....  सीमा असीम  15 10 20

जिंदगी

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 जिंदगी आईने की जैसी होती है  जब आप मुस्कुराते हो  यह भी मुस्कुरा देती है  जब आप रोते हो तो  यह भी रो देती है  जब कभी हो जाते हो आप उदास  तो इसके चेहरे पर भी उदासी छाने लगती है  इसलिए जिंदगी को खुद के अनुसार जियो  अपने में खुश होकर जियो  आप अगर खुद में खुश होकर जीते हो  तो आपको कभी किसी से कोई उम्मीद ही नहीं होती  दूसरों से उम्मीद करना मतलब  जीवन में निराश हो जाना...  सीमा असीम  12, 10, 20
जब दिल गले तक भर आता है  हूक उठती है दिल में और चैन नहीं आता है  खो गया है मन का सुकून जाने कहां मेरा  बात का मलाल मेरे दिल को रह जाता है  तुम समझते मुझे तुम पहचानते मुझे  मेरे दर्द में संग संगआंसू बहाते तुम 

खुशियाँ

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जब अपने हो साथ  जब अपने साथ होते हैं तो  हमें मिल जाती हैं अनगिनत खुशियाँ  सुख और शांति  छोटी छोटी प्यारी प्यारी अपनों की बातें  हमें यादगार पलों से नवाज़ देती हैं  जब कभी तेज हवाएँ चलती हैं तो  मन घबरा जाता है  लेकिन यही हवाएँ हमें मंजिल का पता देती हैं  धीरे धीरे गुजर जाता है वक्त  हम सोचते रह जाते हैं  कभी इसमें व्यस्त  कभी उसमें लगे हुए  दुनिया की रस्में निभाते हुए  भूल जाते हैं खुद को  अपने सपने  अपनी उम्मीदें  सब कर देते हैं दरकिनार  जीवन जी ही नहीं पाते और  न अपने लिए कभी कुछ कर पाते हैं  मन की खुशी क्या है कभी जान ही नहीं पाते  कभी तुम सोचना अपने लिए भी  अपनी खुशियों के लिए भी  कि सच क्या है  झूठ क्या है और  क्या है जीवन को जीने का सच्चा अर्थ ॥  सीमा असीम  7, 10, 20

यात्रा

इस कोरोनावायरस 6 महीने तक लगातार कोई घर में बंद रहेगा तो तो उसका दम तो करना ही है उस सांस लेने को मजबूर हो जाएगा आखिर क्या करें लिखना पढ़ना और दिमाग खफा है रहना कितना ज्यादा डिप्रेशन हो गया आखिर घर से बाहर निकलना बहुत जरूरी होता है ना एक लिखने वाले के लिए लेकिन घर से कोई जाने वाला नहीं था और और मुझे बाहर कहीं घूमने जाना था घर में किसी के पास समय नहीं नहीं और किसी का मन भी नहीं सब अपने लैपटॉप लेकर घर के काम ऑफिस के काम में लगे हुए आंखें मैंने एक युक्ति निकालेंगे देखा फेसबुक पर एक सज्जन जो मेरे जाने वाले थे पहले से और वरिष्ठ साहित्यकार भी उन्होंने फेसबुक पर डाला कि घूमने जाना है कोई साथ चलना चाहे तो चले मैं अंधा क्या चाहे दो आंखें बस उसने फौरन वहां पर कमेंट में लिख दिया मुझे चलना है मुझे ले जा सकते हो तो ले चलो उनका देख लो अगर तुम्हारे साथ जाने के लिए कोई और महिला तैयार है तो ठीक है चलो हम तीन लोग हो जाएंगे और साथ साथ घूम कर आ जाएंगे मुझे भी अच्छा लगा उनका यह जवाब और मैंने एक लड़की और तलाशी ली और हम तीन लोग मिलकर घर से जाने के लिए तैयार हो गए आप जाएं कहां क्योंकि घर से बाहर निकलना एक बहु...

ख्वाब

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 कितने ख्वाब हम बुनते हैं  सोते जागते उठते बैठते  बारीक बारीक सुंदर सजीले ख्वाब  कितनी उम्मीदें   कितनी आशाएं  कितनी आकांक्षाएं  हम पाल लेते हैं  मन ही मन में  सोचते रहते हैं उन ख्वाबों के बारे में   ख्यालों के बारे में  आशाओं के बारे मेंऔर  पूरे करने के लिए हर तरह से प्रयास करते हैं  किसी भी बात की परवाह किए बिना  हम हर ख्वाब को पूरा करना चाहते हैं   लेकिन कहां होते हैं कोई ख्वाब पूरा  कोई खयाल पूरा  कोई आस पूरी  कोई आकांक्षा पूरी  लेकिन होती है  पूरी  कभी-कभी  जब हम उसको सच्चे मन से करते हैं  पवित्र आत्मा से करते हैं  अपने पूरे दिल से करते हैं  तो पूरे हो जाते हैं हर ख्वाब  हर ख्याल   और हर आशा पूरी  सीमा असीम 6, 10, 20

तुम्हें याद करती हूँ

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 हर पल हर क्षण में बस तुम्हें मैं याद करती हूँ   मन ही मन पुकारती रहती हूं तुम्हारा नाम मैं  गुजर इसी तरह मैं सुबह से शाम करती हूँ   मुस्कुराती हूँ कभी मैं नाम लेकर तुम्हारा  कभी मैं चुपचाप खामोश रहती हूं  भूल जाती हूँ मैं दुनिया की सारी रस्में  इतना मैं खुद में ही खो जाया करती हूँ   कभी बेचैन होती हूं मैं इतनी ज्यादा  कि  रातों को नींद  भी नहीं आती  और कभी-कभी मैं तुम्हें ख्वाबों में लाने को   बहुत जल्दी और बार बार सो जाया करती हूँ   तुम भी शायद ऐसे ही परेशान तो होते होंगे  या सब कुछ भुला कर अपनी दुनिया में खोए रहते होगे   खुश रहते होगे  या रोते होगे  इस सोच सोचकर अक्सर मैं उदास रहती हूँ   हां मैं तुम्हें याद करती हूँ  बार-बार करती हूँ   हर बार करती हूं  सुबह से शाम करती हूं और  अपना दिन तुम में ही खोए रहकर गुजार देती हूं  एक एक बात में एक एक चीज  में  बस सिर्फ तुम और तुम ही तुम...... सीमा असीम  5, 10, 20

मुस्कुराना

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 कितना अच्छा लगता है  सुबह सुबह सूरज का निकलना  पंछियों का चहकना  फूलों का खिलना और   रोशनी का बिखर जाना  रात के अंधेरे को मिटाते हुए  जब रोशनी होती है तो  मन खुशी से प्रफुल्लित होता है  बहुत अच्छा लगता है मुझे  दुनिया को रोशनी में देखना  मुझे नहीं पसंद अंधेरा  नहीं पसंद मुझे मुरझाना  नहीं पसंद मुझे रोशनी का कम हो जाना लेकिन सुनो इस सब से भी ज्यादा अच्छा लगता है मुझे  तुम्हारा मुस्कुराना   तुम्हारा मुझ से बतियाना.......   सीमा असीम 3, 10, 20

पहाड़

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 पहाड़ बड़े कोमल होते हैं  इन से बहती है प्रेम धाराएं   ग्लेशियर के रूप में दूर से लगते हैं  निष्ठुर कठोर  करीब से जाकर देखो   तो समझ आते हैं बडे  गुणकारी होते हैं  फूल फल और औषधियों से भरे  यह हरे भरे पहाड़  उन्नत मस्तिष्क उठाए खड़े हुए   अटल अडिग मेरे प्रिय पहाड़...  सीमा असीम 

प्रेम में

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  वे  दोनों में  प्रेम थे  पर कहते नहीं थे कभी  वे कभी  फूल भेजते  और कभी उपहार  नए नये  नाम रचते एक दूसरे का  वे  याद करते और बातें भी करते  वे बार बार साथ चलने को आतुर होते  एक दूसरे की बाहों में बाहें डाल कर   दिन गुजरते जाते आस बढ़ती जाती  यूं ही दिन बीतते रहे  वे खुद से ही हँसते मुस्कुराते बतियाते   बारिश में भीगते  फूलों संग महकते  ओस सा नम होते  किसी पेड़ के तले बैठे रहते  घंटों यूं ही सोचते हुए कि  उन्हें इतना यकीन था  वे मिलेंगे  बार बार मिलेंगे  मिलते रहेंगे  सदियों तक  फिर फिर बिछुड्ने को  क्योंकि वे प्रेम में थे  अद्भुत अनोखे सच्चे प्रेम में ...... सीमा असीम  29,9,20 

चाँद

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 कितना करीब लगता है कभी यह चाँद   इतना करीब कि हाथ बढ़ाओ और छू लो  बिठा लो अपने पास में  कर लो मन की ढेर सारी बातें  कुछ कह लो,  कुछ सुन लो और यही चाँद कभी-कभी कितना दूर लगने लगता है  न जाने क्यों इतना दूर दूर सा  कि उसे हम कुछ कह नहीं सकते  उसे हम कुछ बोल नहीं सकते  उसे हम कुछ सुना नहीं सकते और  हम उससे कुछ सुन भी नहीं सकते  न जाने क्यों वह हमें इतना दूर लगता है?    यह चाँद ज़ब मुस्कुराता है तो कितना प्यारा लगता है  चारों तरफ बिखर जाती है एक उज्जवल आभा  हर तरफ से आने लगती है रोशनी  मन में चमक और खुशी जैसा माहौल पैदा हो जाता है  ज़ब गुस्सा करता है चाँद तो   घिर आते हैं पानी भरे बादल  कालिमा छा जाती है  हर ओर अंधेरा हो जाता हैं  तब उसकी आंखों में कोई पवित्रता नहीं होती है  ऐसा चांद अच्छा नहीं लगता है ना  अच्छा लगता है वो सिर्फ हंसते मुस्कुराते गाते  बतियाते हुए  कुछ कहते हुए और कुछ सुनते सुनाते  हुए....   सीमा असीम

पीहू हमारी

   दौड़ी-दौड़ी फिरती है  पल भर नहीं ठहरती है  कभी पहनती लहंगा चुनरी  कभी फ्रॉक पहनती है  नाना नानी की बेटी रानी   दादा दादी की राज दुलारी   मम्मी पापा जान छिड़कते   घर भर को वह लगती प्यारी  इतनी सुंदर छोटी छोटी आंखें  ख्वाब चमकते उसमें रहते   होठों पर  लाली प्यारी   बातों से लगती है वह कितनी प्यारी कितनी भोली   खाने में बड़े नखरे करती खाना नहीं वो खाती  दूध को तो वह ना हाथ लगाती   चॉकलेट टॉफी लाइम जूस जेम्स पर फिसलती  कितना मनाओ कितना वहलाओ पर वह कभी किसी की बातों में ना आती  अभी तो बहुत छोटी है  1 दिन बड़ी बनेगी  पूरी दुनिया में नाम रोशन करेगी  सब को बहुत खुशी देगी  उससे प्यारी कोई नहीं है  सबसे प्यारी पीहू हमारी  सबसे न्यारी पीहू हमारी  सबसे सुंदर सबसे प्यारी  पीहु  हमारी  पीहू हमारी  आज बेटी डे पर बेटियों के लिए प्रस्तुत है कविता

वो

पंछी

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   चहचहाते हुए पंछी अँधेरे से ही निकल पड़ते हैं  अपने  हौसलों से  अपने घोंसलों से  बेफिक्र होकर ऊँची  उड़ान भरते हुए  वे न किसी डर से ग्रसित हैं  ना किसी भय से  उन्हें नहीं पता कि महामारी कहां फैली है  वे स्वतंत्र है  वे आजाद है  खुली हवा में सांस ले रहे हैं  उन्हें जरूरत नहीं है किसी मास्क की   सैनिटाइजर की  फेस कवर की  वे तो बस अपने हौसलों के साथ उड़ रहे हैं  उची उची उड़ानों से   छू रहे हैं नभ को और  आकाश को...... सीमा असीम 

आस

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  मैं खुश हूँ बहुत खुश कल से ही  फिर क्यों रात को आँसू बहने लगे  प्रेम के रंग अजब हैं  सुख में आँसू  दुख में आँसू  प्रेम का सच्चा साथी है दुख  प्रेम में कभी कहाँ मिला है सुख  फिर एक आस मन में पल गयी है कि  दुख अब सुख में बदलेंगे  संग संग कुछ दूर चलेंगे  चिड़ियों सा मन चहक पड़ेगा  जीवन में  जीवन जीने को मिलेगा  मन का उपवन महक उठेगा  पत्तों पत्तों और डाली डाली पर  सुंदर सा पंछी डोलेगा  मीठे फलों का स्वाद चखेगा  उसका मन कितना खुश होगा  सोच सोच कर मन मुसकाया  आँखों के कोरों पर सुंदर सुखद स्वप्न सजेगा  महक उठेगा  खुशियों के पल में  सारा तन और सारा मन ....... सीमा असीम  15, 9, 20  ,

शाश्वत है

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 प्रेम शाश्वत है  यूं ही तो नही कहा जाता कि प्रेम शाश्वत है   प्रेम  को ना तो घटाया जा सकता है और  ना ही मिटाया जा सकता है  ना खत्म किया जा सकता है और  ना ही मारा जा सकता है  अगर प्रेम है  तो ताउम्र प्रेम रहेगा कभी खत्म नहीं होगा  ना कम होगा  ना ज्यादा होगा ना कभी स्वार्थी होगा  ना कभी प्रेम झूठा होगा   अगर प्रेम हुआ तो हुआ है अगर  मन किसी का हुआ  तो हुआ है   कभी मन को बदला नहीं जा सकता  मन को कभी मारा भी नहीं जा सकता   प्रेम भरा मन कभी नहीं मरता  एक जोत सदा जलती रहती है  विश्वास की......  सच्चा प्रेम हमेशा प्रेम ही रहता है  कभी भी बदलता नहीं क्योंकि  प्रेम शाश्वत होता है  सीमा असीम  9,9,20 

गुनाह

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 आपके गुनाह   आपके शोर मचाने से  चीखने से चिल्लाने से कभी कम नहीं होते  आप गलत हो अगर तो गलत ही हो  चाहे आप कुछ भी कहो  सामने वाला अगर कुछ भी ना कहे  तब भी पता चल जाता है कि  वह सच है या गलत  अगर वह चीख रहा है  चिल्ला रहा है  तभी पता चल जाता है कि वह सच है या गलत  दुनिया में इतनी शक्ति ईश्वर ने हर इंसान को दी है कि  वह समझ सके कि जो उसके साथ हो रहा है या  जो उसके साथ कर रहा है  वह गलत कर रहा है या सही कर रहा है  कुछ समय तक तो इंसान की सब चीजें चल जाती है  लेकिन उसके बाद धीरे-धीरे वह  चीजों को समझने लगता है और  गलत को गलत और सही को सही  डिफाइन कर सकता है  भले ही वह ना कहें  अगर वह नहीं कहता है  इसका मतलब यह नहीं कि  वह जानता नहीं है कि सच क्या है अगर  वह कहता है इसका मतलब यह भी नहीं  कि वह जान गया है कि सच क्या है  इसलिए चुप रहो खामोश रहो  बस देखते रहो दुनिया में क्या हो रहा है  क्या चल रहा है  आप करो वही जो आपका दिल कहता है  जो आ...

ग़म

  शाम-ए-ग़म की सहर नहीं होती,  या हमीं को ख़बर नहीं होती   हां वही तो लगता है कि कभी सुबह होती ही नहीं है जबकि देखो सुबह हो गई है दिन निकल आया है सूरज निकल आया है,  चारो तरफ रोशनी बिखरी पड़ी है, मन में एक दिया तो जल रहा है लेकिन फिर भी अंधेरा है,  चारों तरफ अंधेरा,   कुछ समझ नहीं आता,  किधर से रास्ता निकलेगा,   वह तुम्हारे पास तक जाएगा,  कैसे तुम तक पहुंचाएगा और कैसे तुम्हें मेरे  प्रति पूर्ण समर्पित कर देगा.....  सीमा असीम  8, 9, 20

दुःख

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 अरे दुख सुन तो जरा  तू कितना प्यारा लगने लगा है  मुझे आज कल  तू कितना प्यार करने लगा है  मुझे आजकल  चिपका रहता है गले से और  दिल में दर्द जगाए रहता है  पल भर को भी तो तू दूर नहीं होता है  आंखों में नमी देख कितनी बार भर  जाता है  सोचती ही नहीं मैं अब दुःख के सिवाय कुछ और  आंखें देखो ना कितनी बहती है दर्द से   इनमें से नमी कभी कम नहीं होती   मानो कोई सागर भर दिया है तूने  दुख तू सच में सागर है या  सागर से भी गहरा है  तू कितना प्यारा है जो तू  हमेशा मेरे साथ चिपका रहता है  छोड़ता ही नहीं है मुझे  ना करता है मुझे कभी सुख के हवाले  चेहरे पर मुस्कान खिलाने नहीं देता  हाँ  देता है न तू मुझे ख़ुशी  उदासी,  निराशा और दर्द   अपने इन प्यारे साथियों को चेहरे पर सजाए रखता है  तू मेरा ऐसे साथ निभाये जाता है हरपल में हरदम भी...  सीमा असीम  7, 9, 20

पंख

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मन में अजीब सी बेचैनी है  बेतहाशा तड़प है  रोम रोम में अजीब सी प्रतिध्वनी उठ रही है  कितनी आवाजें आसपास गूँज रही हैं  और मैं अपने ही भीतर डूबी हुई हूँ   सुन रही हूं अपने मन की पुकार कि  आज उग  जाए मेरे पँख और  मैं उड कर पहुंच जाऊं तुम्हारे पास  लगाकर तुम्हें अपने गले से  भूल जाऊं दुनिया को  जैसे अभी भूली हुई हूं  उससे भी कहीं और ज्यादा,,   बस याद रह जाओ सिर्फ तुम  सिर्फ तुम... सुनो   उगा दो न मेरे पंख  सुंदर सजीले रंगीले   तुम तक आने को  बिन कहे सब कह जाने को सीमा असीम  6, 9, 20

अपने

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 पल भर को भी ज़ब अकेले में बैठती हूं  सोचती हूं तो उदासी घिर जाती है  क्या अपने के बगैर भी कोई जी सकता है  क्या अपनों के बगैर भी कोई रह सकता है  अगर अपने ना होते तो इस दुनिया में  ना होती है  खुशियाँ  ना इतनी सुंदर होती दुनिया  ना इतनी खूबसूरत होती  ना इसमें इतना अपनापन होता  ना इसमें कभी जीने का मन होता  अपने है तभी तो जीवन है  अपने हैं तभी तो खुशियां हैं  अपने है तभी तो दिल लगा रहता है  वरना उदासी है  आंसू है  दुख है  दर्द है और  कुछ नहीं  अपनों के बिना दुनिया में कुछ नहीं  अपनों से कभी बिछड़ कर देखो  पल भर में तड़प जाओगे  पल भर में लौट के आ जाओगे  अपनों से बात करके मन को खुशी मिलती है  मन भटकता नहीं है  जो होते हैं अपने अपनों के जैसे  तो नहीं भटकता है मन  ना होता है कभी बेचैन  है अपने है तो बस अपने  अपने तो अपने होते हैं  सीमा सीमा 6, 8, 20

सत्य

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 आप तमाम उम्र सत्य की खोज में रहते हैं  सत्य को जानना चाहते हैं  अपने सत्य नहीं  दूसरों के सत्य और  दूसरों के सत्य के लिए  अपने सत्य को खत्म कर देना चाहते हैं  हम भूल जाते हैं कि हमारा जो सत्य है  वह सिर्फ हम जानते हैं  दूसरों  का सत्य तो सिर्फ वही जान सकता है  हम उसके सत्य को नहीं जान सकते  जैसे वह हमारे सत्य को नहीं जा सकता  किसी भी कीमत पर किसी भी हाल में  रे मन काहे न धीर धरे.....  सीमा असीम 

चुनर...

  कितने दिन बीत गए देखा ही नहीं मैंने  कोई तो होगा जो बुला कर ले आएगा उन्हें  और मिला देगा मुझसे   अब थक गई हूं मैं  अब हार गई हूं मैं  इंतजार कर कर के  ईश्वर से दुआ कर करके   अब तो आओ  आ जाओ  मैं अपनी चुन्नी को  रोज अपने आंसुओं से भिगोती हूं फिर उसे कूट-कूट कर   पटक पटक कर धोती हूं  कि सारा गुस्सा उस पर उतार देती हूँ  कि चुनरी के सारे रंग फीके पड़ गए हैं  कि अब आओ और नई चुनरी दिला जाओ   रंग बिरंगी  सतरंगी  कढ़ाई कसीदे वाली  सबसे सुंदर  सबसे प्यारी  उससे सुंदर चुनरी कोई ना हो   उस जैसा रंग किसी के पास ना हो  आओ  अब तो आओ और अब चले आओ सजन ... .... सीमा असीम  30, 8, 20
 जो चोट तुमने और तुम्हारी आदत  ने मिलकर मेरे मन को पहुंचाई है उसकी भरपाई कौन करेगा?  मेरे अंतस को मेरी आत्मा को घायल और जख्मी किया है उस का न्याय कब होगा?  नीचा दिखाना,  अपमानित करना और हर हाल में बुरा चाहना, उसको कौन देखेगा, कौन समझेगा?  सिर्फ अपना सोचना अपने बारे में बात करना अपने लिए ही कुछ करना ऐसे कैसे चलेगा ऐसे कैसे चलेगा ऐसे कैसे मिलेगा एक तरफा एक तरफा एक तरफा...... 
 कितना स्वार्थी होता है इंसान अपने स्वार्थ के लिए कितना नीचे गिरता है वह भी नहीं देखता कि सामने वाले को ऐसे कितनी तकलीफ हो रही होती है लेकिन जो स्वार्थी इंसान है उसे क्या फर्क पड़ता है वह तू अपने स्वार्थ के लिए ही सब कुछ करता है गिरता है चाहे कुछ भी करता है वह अपने स्वार्थ पूर्ति कर ही देता है स्वार्थी इंसान का कोई जमीर नहीं होता उसके मन में कोई इंसानियत नहीं होती प्रेम की कोई भावना होती है ना किसी के दर्द या दुख से उसे कोई मतलब होता है तू जीता है सिर्फ अपने लिए और अपने लिए ही मर जाता है अपने सुख के लिए वह नए नए रास्ते तलाश था है और उन्हीं रास्तों पर चलता है जिससे सुख मिलता है वह उधर ही जाता है और जिन रास्तों पर वह चलता आया है उन रास्तों पर देखता भी नहीं है क्योंकि वह स्वार्थ पूर्ति कर चुका होता है और उस रास्ते पर जाकर उसे कुछ इतना खास मिलने वाला नहीं होता है स्वार्थी इंसान कभी अपना नहीं हो सकता उसे चाहे आप अपना बनाने के दाग कोशिश करो वह कभी नहीं होगा तुम्हारा कभी नहीं होगा  एक सच्चा इंसान वह सिर्फ तुम्हारा ही रहता है सिर्फ तुम्हारा वह दूसरी तरफ कभी नजर में नहीं डालता उसका ध्य...

दर्द

 दिल भर भर के आता है  आंखों से आंसू बहाता है न जाने क्यों तू मझे इस कदर  बेतरह तड़पाता है.   इस तरह खींचते हैं प्राण  मानो जान निकल जाएगी  आत्मा भी इस तरह तड़पती है  नस नस भी दर्द से खड़कती है  दर्द का कोई ना होता है और छोर  बेदर्दी तुझे भी यूँ दर्द  तो एहसास तो होगा  तू झूठा ही सही  तुझे मुझसे सच्चा प्यार होगा  तेरी हर बात से छल छलकता है  तेरे हर शब्द में स्वार्थ भरा है  लूट लेता है पूरी तरह से रस पूरा निचोड़ देता है  आता है मीठी मीठी बातें बनाता है  इसी बात पर भी भड़क जाता है  गलत को गलत कहो कैसे कहोगे भला  उसे तो बस अपनी तारीफ करवाना ही पसंद आता है  एक दिन जब याद करेगा अपनी मनमानियां  तो पछतायेगा  बहुत पछताएगा  बेदर्दी देखना एक दिन तू मेरे प्यार को तरस जाएगा  सीमा असीम

अहसास

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 अहसास भी बड़े कमाल के होते हैँ  तुम जो नहीं कहते वो भी कह जाते हैँ  कभी रुलाते हैँ जीभर के  कभी मुस्कुराने को मजबूर कर जाते हैँ  घृणा तो कभी द्वेष की भावना को दूर करते हुए   मन में  प्रेम को जगाते हैँ  यह अहसास न होते तो कैसे आते  जीवन में सच्चे भाव  अहसास ही दुनिया में किसी को भी  सही से इंसान की पहचान करना सिखाते हैं...  सीमा असीम  11, 10, 20
 जब हम तो के सागर में गोते लगा रहे होते हैं और हम बेतहाशा आंसू बहा रहे होते हैं उसमें हमारा मन चाहता है कि कोई हमारे सर पर हाथ से राय कंधे थपथपाई पीठ सहला आए और अपने गले से लगा कर कहीं मत रो मत रो मैं हूं ना तुम्हारे साथ लेकिन तब हमारे आस पास ऐसा कोई नहीं होता जो हमें समझा सके हमें बहला सके हमारे दुख को दूर कर सके और यह दुख हमें होते क्यों है इसलिए होते हैं कि हम जिस पर बहुत विश्वास करते हैं बेतहाशा विश्वास करते हैं और वह हमारे विश्वास को तोड़ देता है हम फिर उस पर विश्वास करने लगते हैं पुरानी बातों को भूल कर फिर वह हमारा विश्वास तोड़ देता है और बार-बार वह हमारा विश्वास तोड़ता है हम अपने विश्वास की टूटने पर दुखी होते हैं किसी अपने के द्वारा विश्वास तोड़ने पर दुखी होते ना जाने वह कैसे सोचता होगा ना जाने उसके मन में क्या होता होगा ना जाने वह ऐसे क्यों करता होगा जो हमारा अपना है वह हमें क्यों चूर-चूर कर बिखेर देना चाहता है क्यों हमारे दुख को  बढ़ा देना चाहता है क्यों हमें इतना कष्ट देना चाहता है मुझे नहीं पता नहीं पता नहीं पता हम तो सिर्फ आंसू बहाते हैं और अपने दर्द में डूब जाते है...
हमारा बरेली   इतिहास के पन्नों पर अगर देखा जाए तो हमारा बरेली महाभारत काल में पांचाल देश के नाम से जाना जाता था क्योंकि द्रोपदी का जन्म यहां पर हुआ था और द्रौपदी की जन्म स्थली हमारा बरेली ही था महाभारत काल में राजा द्रुपद यही राज करते थे, दरअसल द्रौपदी की जन्म स्थली बरेली थी और वह पांचाली कही जाती थी क्योंकि वो पांच पतियों की पत्नी थी इस वजह से बरेली को पांचाल प्रदेश भी कहा जाता था...  सीमा असीम   बरेली कॉलेज की स्थापना 1837 में  हुई थी और उस समय ब्रिटिश हुकूमत थी,  18 57 में ज़ब क्रांति का बिगुल बजा तो रुहेलखण्ड  में इस आंदोलन की बागडोर रोहिल्ला सरदार खान बहादुर खान के हाथों में थी उनकी अगुवाई में क्रांतिकारी अंग्रेजों से लोहा ले रहे थे बरेली कॉलेज का शिक्षक मौलवी महमूद हसन और फारसी शिक्षक कुतुब शाह समेत तमाम छात्र इस आंदोलन में शामिल हुए थे कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ कार्लोस बक को क्रांतिकारियों ने मौत के घाट उतार दिया था सीमा   औरंगजेब के शासनकाल के दौरान और उसके बाद भी उसकी मृत्यु के बाद भी बड़े बरेली और उसके आसपास के क्षेत्र में अफगान बस्...

तुम ही मुझे बताओ

   कभी गुस्सा आता है मुझे तुम पर  औ र फिर तुम पर प्यार आ जाता है  ऐसा अक्सर होता है कि  कभी गुस्सा इतना ज्यादा आता है  एकदम ही प्यार इतना ज्यादा आता है  क्या करूं मैं  तुम ही बताओ  कैसे तुम्हें समझा दूँ   सब कुछ बता दूं  तुम ही बताओ  सीमा असीम

उदासी या मुस्कान

 उदासी भी एक भाव है मन का  जो आ जाता है  कभी कभी और  झलकने लगती है चेहरे पर उदासी  लेकिन ज़ब यह आती है तब  साथ में लाती है  दुःख निराशा दर्द  आँसू बेचैनी और आलस  नहीं अच्छी लगती है मुझे जरा भी  यह उदासी....  झीक जाती हूँ खुद से ही  डाँटती हूँ खुद को  देकर तकलीफ और  हर हाल में  दूर करना चाहती हूँ  छुटकारा पाने का हर संभव प्रयास करती हूँ  फिर  झटक के फेंक कर  इस उदासी को  सजा लेती हूँ एक प्यारी सी  सच्ची मुस्कान  चेहरे पर और  आवरण सा लपेट लेती हूँ  अपनी पवित्र आत्मा पर  देख कर इन फूलों को इन  रंगों को  इनकी महकती हुई  खुश्बू से  अपने मन को ख़ुश करते हुए...   सीमा असीम

आस्था

  आस्था मैं देख लेती हूँ अपनी बंद आँखों से सुन लेती हूँ बिन कहे भी मैं पहुँच जाती हूँ बिन चले भी मैं बोलती हूँ बिन बोले भी क्योंकि मेरी नसों में प्रवाहित होता है  सच्चा प्रेम ॥  सीमा असीम
साइंस लेने के बाद सभी बच्चों के लिए डायनिंग हॉल में नाश्ते का अरेंजमेंट किया गया था लेकिन मानसी खुशी के मारे उसे लग रहा था कि पहले घर पहुंच जाए अपनी मम्मी को अपना फेस दिखा दे फिर उसके बाद कुछ और काम करें पर का बोले नहीं पहले तो लेते हैं उसके बाद चलते हैं अरे नहीं यार रहने दो घर पर जाकर खाते हैं मानसी ने कहा  अलका बलारी मानसिक चालू अभी 2 मिनट में बस घर ही चलते हैं और कभी पहले देखो रिक्शावाला भी नहीं आया है अपना जाएंगे कैसे  हां यह तो ठीक है वह सब बातें कर ही रहते हैं उसकी क्लास टीचर आ गई और मानसी की पीठ थपथपाते हुए बोले मुझे तुम पर गर्व है मानसी मुझे विश्वास है तो कोई प्राइस तो जरुर जीतोगे क्योंकि तुम्हारी लगन देखकर लग रहा था लेकिन मुझे यह नहीं पता था कि तुम फर्स्ट प्राइज जीत होगी और उसके साथ में स्पेशल प्राइस भी अपने नाम कर लोगे  थैंक्यू मैम आपने मुझ पर इतना विश्वास रखा अवस्थी विश्वास का फल है कि मैंने यह प्राइस जीता  खुश रहो बेटा खूब तरक्की करो और खूब आगे बढ़ो मैं चाहती हूं अभी तो तुम्हारा केवल डिस्ट्रिक्ट लेवल पर हुआ है फिर नेशनल लेवल पर तुम जाओ उसके बाद तो अंतरराष...

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वह लड़की

प्रेम

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 कितना प्यारा शब्द है प्रेम  प्रेम शब्द मन में आते ही  रोम रोम खिल उठता है  एक झंकार सी मन में जगती है  सच में अगर दुनिया में प्रेम है  तभी तो जीवन है  अगर प्रेम नहीं होगा  तो जीवन कहां से होगा  लेकिन फिर भी लोग प्रेम की जगह  नफरत ज्यादा करते हैं  घृणा ज्यादा करते हैं  वह समझते ही नहीं है प्रेम को  और प्रेम को आस्था में, श्रद्धा में नहीं  बदलते हैं बल्कि   अपने प्रेम को नफरत में बदल देते हैं  इसके पीछे सिर्फ एक बात होती है  कि वह सब  कुछ खुद ही पा लेना चाहते हैं  सिर्फ अपने भले के  लिए करते हैं  इतने स्वार्थी हो जाते हैं  उन्हें अपने अलावा कोई और नजर नहीं आता  सब कुछ अकेले पाने की चाह में  वे सब कुछ खो देते हैं  नहीं समझते प्रेम में पाना होता ही कहां है   प्रेम में तो खोना होता है  प्रेम में सब देना होता है  प्रेम तो समर्पण का नाम है  अगर समर्पण है तो प्रेम है  समर्पण नहीं तो प्रेम नहीं   अहंकारी कैसे देख सकता है  ...
पतली पतली लंबी लंबी एक लंबा सा कुर्ता पजामा और चुन्नी डाले हुए नाक में नथनी कानों में गोल गोल कुंडल हाथों में 22 चूड़ियां
यह सावन की बारिश  रिमझिम सी बूंदे  कितना रंग निखारा है  बारिशों ने इन पत्तों का  इन बूंटो का  मुक्त होकर मन चाहता है इन्हें  अपलक निहारना  बिसरा कर दुनिया  खोये रहना  किसी पंछी की तरह  उन्मुक्त हो बिचरने के लिए  आजन्म  देखते ही इन पत्तों को  इन रंगों को  लगता है जैसे सूरज ने  दिया है  नारंगी रंग  मृदु हवाओं ने दी है   महकती खुश्बू  चांद सितारों जाग कर कोमल आकार  से  नबाजा है  और शबनम ने नहलाया है  शब भर  ले लूँ बलाएं कि नज़र उतार लूँ  कि अब यह धरती झूम झूम के नृत्य करना चाहती है  सुरीली स्वर में श्रंगार गाना चाहती है  मन्नते दुआएं और आजादी के लिए आकुल   पिंजरे में कैद पंछी  देखना चाहता है  अपने पैरों पर पूरा आसमान उठाकर..... 

बेहद उदास

बेहद उदास और आंसू भरी आंखों के साथ मैं लिख रही हूं सच तो यह है कि कभी तुमने मुझे प्यार किया ही नहीं था और ना कभी समझा था प्यार को क्योंकि मैं पहले दिन से आज तक अकेले निभा रही हूं तुमने तो मेरी देगा सादा किया और मुझे छोड़ दिया रोने तड़पने मचलने के लिए अगर प्यार होता तो तुम दूसरी औरतों के प्रति कभी आकृष्ट नहीं होते कभी दूसरी औरत को हाथ भी नहीं लगाते अभी दूसरी औरतों के साथ रिश्ता नहीं निभाते उनकी महफिलों में साथ बैठते मुझे सच में आज दुख इस बात का है कि तुमने मुझे बुलाया फैसला आया और अपना ग्रास बनाया और ठीक वैसा ही तुमने दूसरी औरतों के साथ किया ताज्जुब होता है मुझे कि मैं तुम पर कैसे विश्वास करूंगी कैसे तुम्हें समझूंगी कितना बड़ा शब्द है कितना बड़ा उसका मजाक बना दिया खेल खेल दिया लानत है तुम पर., लानत है तुम पर मैं बार-बार यही शब्द कहूंगी लानत है तुम पर, एक जिस्म को पाने के लिए तुमने ऐसी धोखाधड़ी करें मेरी आत्मा कराहती है तड़पती आत्मा ,  कितनी दर्द से भरी हुई आंसुओं में डूबी हुई, तुमने मेरा फायदा उठाया है हर बार हर बार,, यह सब मैं नहीं कह रही मेरी आत्मा, मेरा दिल कह रहा है.... 
आज ऋषि को मैडम के ऊपर बहुत तेज गुस्सा आया हालांकि वह हमेशा उनकी बात मान लेती है जैसा वह कहती है वैसा ही करती है लेकिन जब उन्होंने उससे कहा कि साइकिल का कहीं से अरेंज कर लो तो उसे लगा कि मैडम हमेशा उस पर बटन डाल देती है इतना सारा आलू कैसे मैनेज करें इन सब चीजों को कहां से लाए साइकिल अगर है उसके पास साइकिल स्टोर रूम में पड़ी हुई है वह कितनी गंदी है उसको उठाकर निकालकर साफ करना और कितना टाइम जाएगा 2 घंटे का टाइम है बस मेरे पास उसमें मैं ना आराम कर पाऊंगी ना मैं खुद सोचो पाऊंगी ना मैं उसे अच्छे से प्ले को फिर कर पाऊंगी लेकिन मैडम को यह सब बातें कहां समझ आती है वह तो बस कह देती है और मैं कहने से मतलब है मैडम मुझसे नहीं हो पाएगा मैं आपको बोल रही हूं प्लीज 2 घंटे का टाइम है मैं कैसे कर पाऊंगी सब कुछ नहीं अब मैं घर पर कहूंगी भाई को या किसी को तो वह मेरी डांट लगाएंगे एक तो मैं कैसी तरह से समय निकालकर घर में सबको कह कर मना कर प्ले करती हूं आपकी वजह से और आप मेरे ऊपर हमेशा कोई ना कोई ऐसा वर्णन डाल देती है जिससे मुझे बहुत परेशानी होती है मैं मेंटली परेशान हो जाती हूं अपने अगर साइकिल निकालकर साफ करू...

उम्मीद

हम एक गिरे हुए शख्स से उम्मीद   करते हैं कि वो हमारी उम्मीदों पर खरा उतरेगा जबकि वो जाहिल और नींच इंसान हमारा फायदा उठायेगा और स्वार्थ पूरा होते ही हमें सिर्फ दुःख और आँसू देगा कि अब तू जिंदगी भर रो और हम मूर्खता वश उस कुत्ते के लिए रोते रहते हैं अपनी उम्मीदों को दिल से लगाये हुए....  सीमा 

मानसी... धारावाहिक कहानी

सुबह हो गई थी और मानसी की आंखों में नींद भर गई,  रात भर तो जागती ही रही थी ! कभी मोबाइल पर मूवी देखती या फिर फेसबुक, टुइटर यह सब चलाते हुए पूरी रात गुजार दी थी!  अपनी पीजी में वह बिल्कुल अकेली थी सारी सहेलियां,  उसके साथ रहने वाली रूममेट वे सब अपने घर चली गई थी मानसी नहीं जा सकी ! क्योंकि उसे हल्का बुखार था और उसे लगा अगर एयरपोर्ट पर उसका बुखार चेक हुआ तो कहीं वह फँस न जाए या फिर उसको कहीं क्वारंटाइन ना कर दिया जाए या फिर कहीं आइसोलेशन के लिए ना भेज दिया जाए !बस यही डर की वजह से वह रुक गई थी कि एक आध दिन में निकल जाएगी लेकिन अगले दिन से ही लॉकडउन लग गया और वह अकेली वही रह गयी !   उसे लगा था कि 1 दिन में बुखार तो उतर ही जाएगा और वह आराम से अगले दिन की फ्लाइट करवा कर निकल जाएगी भले ही ज्यादा पैसे जाए लेकिन घर पहुंच जाएगी, पर उस का सोचा हुआ पूरा नहीं हुआ! बुखार बढ़ गया था ! क्या करें? उसने अपनी मम्मी को फोन किया !   मम्मी ने उसकी आवाज से समझ कर लगा कि उसकी तबीयत सही नहीं है !  मुझसे पूछा क्या तुम सही हो मानसी?   हां मैं बिल्कुल ठीक हूं ! हल...
करीब चार महीने से कहीं भी आना जाना बंद है हम कहीं जा नहीं सकते और कोई हमारे घर आ नहीं सकता मुझे समझ नहीं आता कि मैं इतना परेशान और दुखी क्यों हूँ ?क्यों नहीं मन संभालता है ? क्यों हर समय मैं दुखी परेशान और उदास रहती हूँ ? क्यों किसी काम में मन नहीं लगता है ? क्यों रोना रोना और सिर्फ रोने का मन करता है ? मुझे लगता है यह स्थिति तो हर किसी के साथ होगी सभी लोग अपने अपने घरों में ही बंद हैं तो क्या वे सभी उदास परेशान और निराश हो गए हैं ? सब मेरी ही तरह से रोने को मजबूर हो गए हैं और यूं ही दुखी होकर रोते हैं और दिल भर जाने तक रोते रहते हैं ? अगर हाँ तो इसका क्या इलाज है ? यह कैसे सही होगा ? क्योंकि कभी कभी मन इतना परेशान होता है कि कुछ समझ नहीं आता, क्या करें ? कैसे करें कि यह पीड़ा कम हो जाये । हम अपने दुख कैसे किसी को बताएं ? कैसे कहें उनसे कि हम निराशा के दौर से गुजर रहे हैं और इस सब से उबरने का कोई रास्ता नजर नहीं आता है । 

वफ़ा

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इन उदास पलों में  खामोशियों को अपना साथी बना कर  मौन की चादर ओढ़ कर  इतनी जोर से चीत्कार करूं   कि गूंज जाए सारा आकाश धरती ब्रह्मण्ड   रो रो कर निकाल दूं मन की सारी भड़ास  सारे दुख सारे कष्ट बहा दूँ आंसुओं में  ईश्वर ने  दुनिया में इंसानों के रूप में   शैतान बनाए हैं  वफा के बदले में करते हैं हमेशा बेवफाई  उनकी बेवफाई को  कभी याद ना करूं   भुला दूं मैं सारी बेवफाई  बेवफा को नहीं मालूम वफा के मायने   झूठ झूठ हर बार झूठ  कैसे समझाऊं अपने मन को  कैसे मनाऊं मैं अपने मन को  हार जाती हूं थक जाती हूं  बार-बार हर बार  मुझे जीतना नहीं   मुझे हारना है   लेकिन तुम्हारे सच पर  तुम्हारी झूठ पर नहीं  तुम्हारे झूठ पर नहीं  सीमा असीम

एक से...

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चाहती हूं मैं कि तुम बन जाओ बिल्कुल मेरे जैसे  जैसे मैं हँसू तो  तुम भी हंसो  जब मैं गाउँ तो तुम भी गाओ  जब मैं नाचूं तो तुम भी नाचो  या फिर बात करूं तो तुम भी बात करो  जब मैं उदास हो जाऊं तो तुम भी उदास हो जाओ  जब मैं घूमने के लिए कहीं पहाड़ों पर चली जाऊं  तो तुम भी मेरे साथ साथ चले आओ  क्योंकि मैं चाहती हूं तुम हो जाओ बिल्कुल मेरे जैसे   या फिर मैं हूं जाऊं बिल्कुल तुम्हारे जैसी  जब तुम रोओ तो मैं भी रोऊं  जब तुम उदास हो तो मैं भी उदास हो जाऊं  जब तुम रूठो तो मैं भी रुठ जाऊँ   जब तुम्हें गाना गाने का मन करे उदासी वाला  तब मैं भी उदासी वाला गाना गाउँ   तब जब तुम्हारा जो दिल करे  तो ऐसा ही मेरा दिल करने लग जाए  काश ऐसा ही हो जाए कि हम एक से हो जाए  या तो तुम हो जाओ मेरे जैसे  या फिर मैं हो जाऊं तुम्हारे जैसी  कोई भी अंतर ना रहे हम दोनों में  या मैं हो जाऊं तुमसी  या तुम हो जाओ मुझसे..  सीमा असीम

ख्वाबों की दुनिया

ख्वाबों के लिए  सोना जरूरी नहीं होता  जरुरी होता है ख्वाब देखना  कभी तुम्हें याद करना  जी भर रोना लेकिन   नहीं अच्छा लगता मुझे रोना  फिर क्यों उदास हो जाती हूं रोने लग जाती हूं  किया करो ना बात तुम हमसे   हर एक बात मुझसे  अच्छा लगता है ना  बात करना मन की कहना  हल्का सा मन हल्का हल्का सा  भारी भारी पल में जीना मुश्किल लगता है जीना भी अच्छा नहीं लगता  तुम बिन 

तुलसी का बिरवा

कविता तुलसी का बिरवा     मां के घर के आंगन में लगा   एक छोटा तुलसी का बिरवा   जिसमें मां सुबह-सबह जल चढ़ाती     शाम को दिया जलाती और   उसकी प्रतिदिन करती   पूजा अर्चना     कार्तिक पूर्णिमा के दिन उनकी शादी करती    और देती रहती नसीहतें कि तुलसी के पौधे पर   इतवार के दिन ना जल चढ़ाना   और ना उसका पत्ता तोड़ना   मां कितनी अच्छी बातें बताती थी     उस बिरवे से कितनी रौनक़ थी हमारे घर में   अब कोई नहीं लगाता   अपने घरों में तुलसी का बिरवा   ना ही कोई अब जल चढ़ाता   न उनकी शादी रचाता     अब तो लोग लगाते हैं तुलसी का पेड़   चाय में डालने को   काढ़े में डालने को   अपनी इम्यूनिटी बढ़ाने को   दवा बनाने को   उनका व्यापार करने को   क्योंकि हर चीज में देखते हैं आजकल   इंसान अपना स्वार्थ   अपना कारोबार   अपना व्यापार   अपना धन   कैसे बढ़ाएं ऐसा कोई तरीका     ...