चाँद
कितना करीब लगता है कभी यह चाँद
इतना करीब कि हाथ बढ़ाओ और छू लो
बिठा लो अपने पास में
कर लो मन की ढेर सारी बातें
कुछ कह लो, कुछ सुन लो
और यही चाँद कभी-कभी कितना दूर लगने लगता है
न जाने क्यों इतना दूर दूर सा
कि उसे हम कुछ कह नहीं सकते
उसे हम कुछ बोल नहीं सकते
उसे हम कुछ सुना नहीं सकते और
हम उससे कुछ सुन भी नहीं सकते
न जाने क्यों वह हमें इतना दूर लगता है?
यह चाँद ज़ब मुस्कुराता है तो कितना प्यारा लगता है
चारों तरफ बिखर जाती है एक उज्जवल आभा
हर तरफ से आने लगती है रोशनी
मन में चमक और खुशी जैसा माहौल पैदा हो जाता है
ज़ब गुस्सा करता है चाँद तो
घिर आते हैं पानी भरे बादल
कालिमा छा जाती है
हर ओर अंधेरा हो जाता हैं
तब उसकी आंखों में कोई पवित्रता नहीं होती है
ऐसा चांद अच्छा नहीं लगता है ना
अच्छा लगता है वो सिर्फ हंसते मुस्कुराते गाते बतियाते हुए
कुछ कहते हुए और कुछ सुनते सुनाते हुए....
सीमा असीम

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