दुःख
अरे दुख सुन तो जरा
तू कितना प्यारा लगने लगा है
मुझे आज कल
तू कितना प्यार करने लगा है
मुझे आजकल
चिपका रहता है गले से और
दिल में दर्द जगाए रहता है
पल भर को भी तो तू दूर नहीं होता है
आंखों में नमी देख कितनी बार भर जाता है
सोचती ही नहीं मैं अब दुःख के सिवाय कुछ और
आंखें देखो ना कितनी बहती है दर्द से
इनमें से नमी कभी कम नहीं होती
मानो कोई सागर भर दिया है तूने
दुख तू सच में सागर है या
सागर से भी गहरा है
तू कितना प्यारा है जो तू
हमेशा मेरे साथ चिपका रहता है
छोड़ता ही नहीं है मुझे
ना करता है मुझे कभी सुख के हवाले
चेहरे पर मुस्कान खिलाने नहीं देता
हाँ देता है न तू मुझे ख़ुशी
उदासी, निराशा और दर्द
अपने इन प्यारे साथियों को चेहरे पर सजाए रखता है
तू मेरा ऐसे साथ निभाये जाता है
हरपल में हरदम भी...
सीमा असीम
7, 9, 20

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