पंख

मन में अजीब सी बेचैनी है 
बेतहाशा तड़प है
 रोम रोम में अजीब सी प्रतिध्वनी उठ रही है
 कितनी आवाजें आसपास गूँज रही हैं
 और मैं अपने ही भीतर डूबी हुई हूँ 
 सुन रही हूं अपने मन की पुकार कि 
आज उग  जाए मेरे पँख और 
मैं उड कर पहुंच जाऊं तुम्हारे पास
 लगाकर तुम्हें अपने गले से
 भूल जाऊं दुनिया को 
जैसे अभी भूली हुई हूं 
उससे भी कहीं और ज्यादा,, 
 बस याद रह जाओ सिर्फ तुम
 सिर्फ तुम...
सुनो 
 उगा दो न मेरे पंख
 सुंदर सजीले रंगीले 
 तुम तक आने को 

बिन कहे सब कह जाने को
सीमा असीम 
6, 9, 20

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