ग़म

 शाम-ए-ग़म की सहर नहीं होती, 

या हमीं को ख़बर नहीं होती 

 हां वही तो लगता है कि कभी सुबह होती ही नहीं है जबकि देखो सुबह हो गई है दिन निकल आया है सूरज निकल आया है,  चारो तरफ रोशनी बिखरी पड़ी है, मन में एक दिया तो जल रहा है लेकिन फिर भी अंधेरा है,  चारों तरफ अंधेरा,   कुछ समझ नहीं आता,  किधर से रास्ता निकलेगा,   वह तुम्हारे पास तक जाएगा,  कैसे तुम तक पहुंचाएगा और कैसे तुम्हें मेरे  प्रति पूर्ण समर्पित कर देगा..... 

सीमा असीम 

8, 9, 20

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