पंछी


 

 चहचहाते हुए पंछी अँधेरे से ही निकल पड़ते हैं 

अपने  हौसलों से 

अपने घोंसलों से 

बेफिक्र होकर

ऊँची  उड़ान भरते हुए 

वे न किसी डर से ग्रसित हैं 

ना किसी भय से 

उन्हें नहीं पता कि महामारी कहां फैली है 

वे स्वतंत्र है 

वे आजाद है 

खुली हवा में सांस ले रहे हैं 

उन्हें जरूरत नहीं है किसी मास्क की 

 सैनिटाइजर की

 फेस कवर की 

वे तो बस अपने हौसलों के साथ उड़ रहे हैं 

उची उची उड़ानों से 

 छू रहे हैं नभ को और 

आकाश को......

सीमा असीम 



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