तुलसी का बिरवा

कविता

तुलसी का बिरवा 

 

मां के घर के आंगन में लगा 

एक छोटा तुलसी का बिरवा 

जिसमें मां सुबह-सबह जल चढ़ाती 

 शाम को दिया जलाती और 

उसकी प्रतिदिन करती 

पूजा अर्चना 

 कार्तिक पूर्णिमा के दिन

उनकी शादी करती  

और देती रहती नसीहतें

कि तुलसी के पौधे पर 

इतवार के दिन ना जल चढ़ाना 

और ना उसका पत्ता तोड़ना

 मां कितनी अच्छी बातें बताती थी 

 

उस बिरवे से कितनी रौनक़ थी हमारे घर में 

अब कोई नहीं लगाता 

अपने घरों में तुलसी का बिरवा

 ना ही कोई अब जल चढ़ाता 

न उनकी शादी रचाता 

 अब तो लोग लगाते हैं तुलसी का पेड़ 

चाय में डालने को 

काढ़े में डालने को 

अपनी इम्यूनिटी बढ़ाने को 

दवा बनाने को 

उनका व्यापार करने को 

क्योंकि हर चीज में देखते हैं आजकल 

इंसान अपना स्वार्थ

 अपना कारोबार 

अपना व्यापार 

अपना धन 

कैसे बढ़ाएं ऐसा कोई तरीका 

 

मां तुम मुझे बहुत याद आती हो 

मुझे तुमसे मिलना है लेकिन 

इस कोरोना काल की वजह से 

हम नहीं आ पाते तुम्हारे पास 

करने तुमसे अपने मन की बात

 हम जल्दी ही आएंगे माँ

तुम अपना ख्याल रखना

जैसे तुम रखती थी ख्याल

तुलसी के बिरवा का.... 

 

सीमा असीम


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