प्यारी है परिंदों की दुनिया
कितनी प्यारी है
पशु पंक्षियों की दुनिया
मस्त हो विचरते हैँ
इंसानों से नहीं होते हैं
छल कपट प्रपंच से दूर
वे नहीं बनाते हैं
खुद को स्वार्थी
वे होते हैं
सच्चे साथी
मरने तक
नहीं छोड़ते साथ
निभाते हैं एक साथ
काश मैं परिंदा हो जाऊ
इन इंसानों की दुनिया से
दूर चली जाऊँ
क्षितिज पर बना लूँ
मैं बसेरा अपना
आसमां को अपने हाथ से छू आऊं
फिर तोड़ दूँ
ब्रह्मांड को
अपने हाथो से
हर बंधन से दूर हो जाऊँ
मैं भोलेपन को जी लूँ जीभर
सच्चे मन से
नश्वर दुनिया को
दिल से भुला दूँ
सीमा असीम
7, 6, 20

स्वछंद मन की खूबसूरत पंक्तिया...
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