मैं लिखूँ तुम्हें

सुनो मैं लिखूँ तुम्हें 

मैं लिख दूँ हवाओं पर 
फूलों भरी डाली से 
कि महक जायें फिज़ाएँ 

मैं लिखूँ पानी पर 
लहरों की लकीरों से  
कि होती रहें बरसातें   

मैं लिखूँ आसमाँ पर 
रंग भर  दूँ नए नए 
कि उभर आए इंद्र्धानुष 

मैं लिखूँ पेडों पौधों के तनों पर 
उकेर दूँ अपने नाम 
कि बनी रहे हरियाली 

मैं लिखूँ पर्वतों की ऊंची चोटियों पर 
अंकित कर दूँ प्रेम चिन्ह 
कि हो जाये अमर हमारा प्रेम 

सीमा असीम 
6,6,20 



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