बेचैनियाँ
मन का क्या है हो जाता है कभी भी
कहीं भी
उदास
निराश
परेशान
भर जाता है बेचैनियों से
घबरा कर
मचल जाता है
घिर जाता है
अनिश्चिता में
न जाने कब
होंगी
खुशियों की सुबह
न जाने कब
खिलेंगे फूल
न जाने कब
मुस्कुरा उठेगा मन
जैसे गाने लगती है कोयल
आम के पेड़ पर
सुमधुर स्वर में
खींचे लिए जाती है
मुग्ध करके
भुला कर सुध बुध
वैसे ही मेरे सनम
तुम्हारे खामोश शब्द
पुकार उठते हैँ मुझे
मैं तड़प उठती हुँ
इस विरह को जीते हुए
और उसी क्षण
तुमसे मिलने को बेचैन हो जाती हुँ
फ़िर कहीं चैन नहीं पाती हुँ
बेक़रार हो
अपना सिर टिका देती हुँ
मैं हार जाती हुँ सनम
अपने प्रेम से
प्रेम के लिए
बेचैनियों में
घिरकर
सीमा असीम
8, 6, 20

Comments
Post a Comment