मेरा ईश्वर

दर्द कोई देता है ज़ब मुझे 
कराह उठती है 
आत्मा मेरी 
रोती है 
चीखती है 
चिंघाड़ती है 
घायल कर लेती है खुद को ही 
पर नहीं कहती है 
कभी भी किसी से भी कुछ 
सह जाती है अकेले ही 
सबकुछ 
ख़ामोशी से 
फ़िर पोंछ देती है 
मेरे बहते आँसू 
सहला देती है 
मुझे प्यार से 
खिला देती 
फूलों सी कोमल मुस्कान 
उदास आँखों में भरती है चमक 
दर्द से भरे जिस्म पर 
मीठी सी छुअन 
और 
आ जाती है 
जीवन में खुशियाँ 
जाग जाती है मेरी आत्मा 
जहाँ पर 
रहता है 
मेरा ईश्वर 
हाँ बसता है मेरा ईश्वर 
मेरी आत्मा में 
जो नहीं होगा कभी जुदा मुझसे 
मेरे जीवन में 
या मरने के बाद भी..
सीमा असीम 
9, 6, 20


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