प्रेम

 कितना प्यारा शब्द है प्रेम

 प्रेम शब्द मन में आते ही

 रोम रोम खिल उठता है

 एक झंकार सी मन में जगती है 

सच में अगर दुनिया में प्रेम है

 तभी तो जीवन है 

अगर प्रेम नहीं होगा 

तो जीवन कहां से होगा 

लेकिन फिर भी लोग प्रेम की जगह 

नफरत ज्यादा करते हैं 

घृणा ज्यादा करते हैं

 वह समझते ही नहीं है प्रेम को 

और प्रेम को आस्था में, श्रद्धा में नहीं  बदलते हैं बल्कि 

 अपने प्रेम को नफरत में बदल देते हैं 

इसके पीछे सिर्फ एक बात होती है 

कि वह सब  कुछ खुद ही पा लेना चाहते हैं 

सिर्फ अपने भले के  लिए करते हैं 

इतने स्वार्थी हो जाते हैं 

उन्हें अपने अलावा कोई और नजर नहीं आता

 सब कुछ अकेले पाने की चाह में 

वे सब कुछ खो देते हैं 

नहीं समझते प्रेम में पाना होता ही कहां है 

 प्रेम में तो खोना होता है

 प्रेम में सब देना होता है 

प्रेम तो समर्पण का नाम है 

अगर समर्पण है तो प्रेम है 

समर्पण नहीं तो प्रेम नहीं 

 अहंकारी कैसे देख सकता है

 प्रेम की कोमलता को

 वह तो पल भर को भी नहीं देखेगा 

अपनी कठोरता 

अपनी निष्ठुरता 

प्रेम बहुत प्यारा शब्द है 

इसे हर कोई नहीं समझ सकता

 कभी नहीं समझ सकता 

सच्चे प्रेम को कोई नहीं समझ सकता.....

प्रेम की असीमता को 

प्रेम की अनंतता को..... 




 सीमा असीम

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