ख्वाब


 कितने ख्वाब हम बुनते हैं

 सोते जागते उठते बैठते

 बारीक बारीक सुंदर सजीले ख्वाब

 कितनी उम्मीदें 

 कितनी आशाएं

 कितनी आकांक्षाएं 

हम पाल लेते हैं 

मन ही मन में

 सोचते रहते हैं उन ख्वाबों के बारे में 

 ख्यालों के बारे में

 आशाओं के बारे मेंऔर

 पूरे करने के लिए हर तरह से प्रयास करते हैं

 किसी भी बात की परवाह किए बिना

 हम हर ख्वाब को पूरा करना चाहते हैं 

 लेकिन कहां होते हैं कोई ख्वाब पूरा 

कोई खयाल पूरा 

कोई आस पूरी 

कोई आकांक्षा पूरी

 लेकिन होती है  पूरी 

कभी-कभी 

जब हम उसको सच्चे मन से करते हैं 

पवित्र आत्मा से करते हैं 

अपने पूरे दिल से करते हैं 

तो पूरे हो जाते हैं हर ख्वाब 

हर ख्याल 

 और हर आशा पूरी

 सीमा असीम

6, 10, 20

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