कोरोना वायरस के कारण देश की अर्थ व्यवस्था लड़खड़ा गयी थी। लग रहा था कि अपना विकासशील देश लुढ़ककर अविकसित देश की गोद में जा बैठेगा। सरकार परेशान थीं। 

ज्यादातर राज्य की सरकारों ने फल/सब्जी/केमिस्ट और पंसारी की दुकानें खुलवा रखी थीं। लेकिन अर्थ व्यवस्था की डूबती नैया को इन तिनकों से उबारना अब मुश्किल लग रहा था। 


अचानक सरकार को जाने क्या सूझी! उसने नशेडिय़ों के सिर पर देश की अर्थ व्यवस्था का भार लादने की ठान ली। 

 शराब प्रेमियों ने अपने कर्तव्य का पालन करते हुए अर्थ व्यवस्था को अपने कंघे पर मजबूती से धरा और आगा-पीछा देखे बिना ही दौड़ पड़े। 


लड़खड़ाकर यहाँ - वहाँ गिरे / पड़े, शौकीन और बेसुध लोग सच्ची मायने में बैसाखी साबित हुए।

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