तुम्हें याद करती हूँ
हर पल हर क्षण में बस तुम्हें मैं याद करती हूँ
मन ही मन पुकारती रहती हूं तुम्हारा नाम मैं
गुजर इसी तरह मैं सुबह से शाम करती हूँ
मुस्कुराती हूँ कभी मैं नाम लेकर तुम्हारा
कभी मैं चुपचाप खामोश रहती हूं
भूल जाती हूँ मैं दुनिया की सारी रस्में
इतना मैं खुद में ही खो जाया करती हूँ
कभी बेचैन होती हूं मैं इतनी ज्यादा
कि रातों को नींद भी नहीं आती
और कभी-कभी मैं तुम्हें ख्वाबों में लाने को
बहुत जल्दी और बार बार सो जाया करती हूँ
तुम भी शायद ऐसे ही परेशान तो होते होंगे
या सब कुछ भुला कर अपनी दुनिया में खोए रहते होगे
खुश रहते होगे या रोते होगे
इस सोच सोचकर अक्सर मैं उदास रहती हूँ
हां मैं तुम्हें याद करती हूँ
बार-बार करती हूँ
हर बार करती हूं
सुबह से शाम करती हूं और
अपना दिन तुम में ही खोए रहकर गुजार देती हूं
एक एक बात में एक एक चीज में
बस सिर्फ तुम और तुम ही तुम......
सीमा असीम
5, 10, 20

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