सनम हरजाई
कैसी जमी है थोड़ी सी नमी है
छल छल छलकती है बरसात आंखों से
एक तेरी कमी है यह तेरी कमी है
ज़ब यादों का बबंडर सीने में उठता है
दिल फिर किसी हाल नहीं संभलता है
तू हरदम साथ होने का अहसास देता है
तो मन क्यों मेरा इतना मचलता है
तू लग जाये आकर मेरे गले से
हर शय से बस यह दिल दुआ करता है
पोछ देना मेरे बह बह कर सूखे हूए आँसू
लेकिन यह बता तू क्यों इतनी सजा देता है
मेरे मर्ज़ को बढ़ाकर तू मुझे मार देता है
सनम कहूं तुझे या हरजाई कह दूँ
बनाता ही क्यों है ज़ब बार बार मिटा देता है...
सीमा असीम
21, 10, 20
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