यह सावन की बारिश
रिमझिम सी बूंदे
कितना रंग निखारा है
बारिशों ने इन पत्तों का
इन बूंटो का
मुक्त होकर मन चाहता है इन्हें
अपलक निहारना
बिसरा कर दुनिया
खोये रहना
किसी पंछी की तरह
उन्मुक्त हो बिचरने के लिए
आजन्म
देखते ही इन पत्तों को
इन रंगों को
लगता है जैसे सूरज ने दिया है
नारंगी रंग
मृदु हवाओं ने दी है
महकती खुश्बू
चांद सितारों जाग कर कोमल आकार से
नबाजा है
और शबनम ने नहलाया है
शब भर
ले लूँ बलाएं कि नज़र उतार लूँ
कि अब यह धरती झूम झूम के नृत्य करना चाहती है
सुरीली स्वर में श्रंगार गाना चाहती है
मन्नते दुआएं और आजादी के लिए आकुल
पिंजरे में कैद पंछी
देखना चाहता है
अपने पैरों पर पूरा आसमान उठाकर.....
Comments
Post a Comment