करीब चार महीने से कहीं भी आना जाना बंद है हम कहीं जा नहीं सकते और कोई हमारे घर आ नहीं सकता मुझे समझ नहीं आता कि मैं इतना परेशान और दुखी क्यों हूँ ?क्यों नहीं मन संभालता है ? क्यों हर समय मैं दुखी परेशान और उदास रहती हूँ ? क्यों किसी काम में मन नहीं लगता है ? क्यों रोना रोना और सिर्फ रोने का मन करता है ? मुझे लगता है यह स्थिति तो हर किसी के साथ होगी सभी लोग अपने अपने घरों में ही बंद हैं तो क्या वे सभी उदास परेशान और निराश हो गए हैं ? सब मेरी ही तरह से रोने को मजबूर हो गए हैं और यूं ही दुखी होकर रोते हैं और दिल भर जाने तक रोते रहते हैं ? अगर हाँ तो इसका क्या इलाज है ? यह कैसे सही होगा ? क्योंकि कभी कभी मन इतना परेशान होता है कि कुछ समझ नहीं आता, क्या करें ? कैसे करें कि यह पीड़ा कम हो जाये । हम अपने दुख कैसे किसी को बताएं ? कैसे कहें उनसे कि हम निराशा के दौर से गुजर रहे हैं और इस सब से उबरने का कोई रास्ता नजर नहीं आता है ।
मुस्कुराना
कितना अच्छा लगता है सुबह सुबह सूरज का निकलना पंछियों का चहकना फूलों का खिलना और रोशनी का बिखर जाना रात के अंधेरे को मिटाते हुए जब रोशनी होती है तो मन खुशी से प्रफुल्लित होता है बहुत अच्छा लगता है मुझे दुनिया को रोशनी में देखना मुझे नहीं पसंद अंधेरा नहीं पसंद मुझे मुरझाना नहीं पसंद मुझे रोशनी का कम हो जाना लेकिन सुनो इस सब से भी ज्यादा अच्छा लगता है मुझे तुम्हारा मुस्कुराना तुम्हारा मुझ से बतियाना....... सीमा असीम 3, 10, 20
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