मन
यह मेरा मन कभी कैसा होता है
ना जाने कितनी बातें करता है
खुद से ही कहता है सुनता है
हंसता है कभी रोता है
और कभी डूब जाता है
बहुत गहरे, गहराई में मन की
और फिर उबरना ही नहीं चाहता वहां से
उसे डूबे रहने में ही सुख मिलता है
बाहर आते ही दुखी उदास हताश निराश हो जाता है
ना जाने क्या चाहता है मन
कुछ चाहता है तुमसे
अनोखा सा पर
तुम मिल तो सकते हो
लेकिन थोड़ी देर के लिए
कुछ समय के लिए
और फिर बिछड़ जाते हो
बिना किसी बादे के बिना किसी कसम के रस्म के
ना जाने कब मिलने के लिए
ना जाने कब साथ उठने बैठने खाने पीने के लिए
सोचता ही नहीं है मन
समझता ही नहीं है मन
बेकाबू सा बेचैन सा
भागा चला जाता है
खिंचा चला जाता है
उसकी तरफ़
उस ओर
जिधर कोई परवाह ही नहीं
कोई फिक्र ही नहीं
कोई इंतजार ही नहीं
या खामोशियों में लिपटे
गरम एहसासों की तरह
लपेट लेता है मन को मेरे
कभी ना दूर जाने देने के लिए
कभी इधर उधर भटकने ना देने के लिए
तेरे पास तेरे लिए
मन मेरा मन
तू तो है सिर्फ मेरा ही
सीमा असीम
4, 11, 20
अति सुंदर। बधाई।
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