तुम्हें भी होता होगा न

 जो दुःख जो कष्ट मेरी आत्मा को होता है 

क्या तुम्हें भी होता है 

जिस तरह से मेरा जिस्म बेजान हो जाता है 

क्या तुम्हारा भी होता है 

न सुध होती है खाने की न पीने की होती है 

क्या ऐसा ही तुम्हारे साथ भी होता है 

ज़ब बेतहाशा बहते हैं मेरे आँसू रुकते ही नहीं किसी तरह 

तो क्या तू भी रोता होगा 

भूल जाती हूँ सारी दुनिया याद रहते हो सिर्फ तुम ही 

क्या तुम भी यूँ ही भूल जाते हो सब 

दिन रात रटता है मेरा मन तेरा ही नाम 

क्या तू भी करता है ऐसा 

पल पल याद करती हूँ मैं तुझे 

क्या तू भी याद करता है मुझे 

ज़ब कोई आकर कहता है कि उससे मेरा मिलना जुलना 

होता रहता है 

तो मन विश्वास ही नहीं करता है क्योंकि तू तो मेरा है न 

सिर्फ मेरा ही तो कैसे कोई तुझसे मिल सकता है 

या फिर तू ही कहाँ किसी से मिलता होगा 

मेरे सिवाय तुझे कोई नजर ही कहाँ आता होगा 

जैसे मैं तेरे अलावा किसी को देख नहीं पाती हूँ दुनिया में 

हैं न? 

सीमा असीम 

5, 11, 20

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