पुलकित है धरा
सर्द कठोर हवाओं के मध्य बहने लगती हैं मृदुहवाएं
सहलाने लगती हैं बालों औ गालों को चूमकर
ओ आसमां यह हवाओं का चूमना नहीं बल्कि थाम लेना है तुम्हारा
चुपके से आकर
गा उठती है सुंदर गीत फिज़ाएँ
उस गायन में साथ देने लगते हैं
स्वर से स्वर मिलाकर
धरा साथ है हमेशा हरहाल में
वादा है खुद का खुद से धरा का
दूर नहीं तुझसे भले ही असम्भव हो मिलन धरा आसमां का
वे संग हैं मन से
एक गौरैया फुदकती हुई आकर बैठ जाती है
पेड़ की शाख पर चीं चीं कर चहकती गुनगुनाती सी
वो गवाह है इस बात की
कि प्रेम मृदु हवाओं सा बहता है
जो कभी नहीं मिटेगा मिटाने की तमाम कोशिशों
के बाद भी
रहेगा यूँ ही अमिट अनंत काल तक
धरा का प्यार है आसमां
है उसकी चाहत
पुलकित हो उठती है धरा अहसास भर से ही
मृदु हवाएं बहती रहती है
पत्ते शाखों संग झूमने लगते हैं
दरख़्त एकटक हो निहारने लगते हैं
आसमां मुस्कुरा जो देता है स्नेह से भरकर
देख कर
धरा को यूँ खुश होते हुए !!! सीमा असीम
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