गतांक से आगे 
दिल में हूक का उठना मन मचल मचल जाना 
कभी जी भर रो लेना कभी सिसक सिसक जाना
सुनो मेरे प्रिय ,  
मुझे याद है वो पल जब वर्फ से घिरे उस सुंदर से प्रेम के महल में, जहां हमारी रक्षा कर रहे थे देवों के प्रतीक देवदार अपनी सफ़ेद धुनि रमाए और आसमा हम पर निरंतर बरसा रहा था पवित्र नूर ,,,उस वक्त तुमने मेरा हाथ अपने हाथों में लेकर कहा था मेरी प्राणों से प्रिय प्रियतमा मैं तेरा हूँ और तू मेरी है हर हाल में और हर तरह से ,,,क्या तुम्हें याद है प्रिय कि हमारा प्रेम सिर्फ प्रेम भर नहीं है यह तो ईश्वर का आशीष है जो उन्होने हमारे ऊपर अपना वरद हस्त रख कर दिया है,,, तो तुम क्यों भूल जाते हो अपनी कही हुई हर बात को ?क्यों लिप्त हो जाते हो झूठी दुनियाँ की झूठी ललसाओं में, लिपसाओं में... क्या तुम मुझे पल भर को भी याद नहीं कर पाते हो, जैसे ही यह ख्याल भर ही मेरे मन में आता है कि तुम्हें मेरी याद नहीं आती या मेरी परवाह नहीं है तभी न जाने कहाँ से तुम मेरे कानों में घोल जाते हो अपनी मधुर आवाज कि मैं तो तेरे पास ही हूँ, कहाँ दूर हूँ क्षण भर को भी ,,,तुम सही कहते हो प्रिय लेकिन मेरा दिल क्यों भर आता है,,, बार बार क्यों उदासियों से घिरा रहता है ,,,क्यों नहीं खुल के मुस्कराता है मेरा मन ,,क्यों नहीं बिखेर देता है मोहक मुस्कान मेरे लबों पर,, क्यों कुछ भी अच्छा नहीं लगता ..अजब सा ताप जिस्म में भरा रहता है और खाने की तरफ देखने का मन ही करता,, किसी काम को करना रुचिकर ही नहीं लगता,, मन ही नहीं होता इस दुनियाँ को देखने का ...इसके बारे में पल भर को भी सोचने का ...यह कैसा सम्मोहन है प्रिय कि कुछ कह कर भी कुछ कहा नहीं जाता और कहे बिना रहा भी नहीं जाता ,,,॥
वो पुण्य फल कब फलित होंगे प्रिय कि जब मैं तुम्हारे पवित्र आरलिंगन में आकर पुनः खुद को बिसरा दूँगी कुछ और भी ज्यादा ॥तुम्हारा वही स्पर्श जो मेरी रूह में और नस नस में समाहित होता रहता कब पुनः महसूस होगा ,,वो धड़कनों कि लय जो मेरी धड़कनों में प्रतिपल संगीत बिखेरती है वो पुनः कब एक लय होगी ???
प्रिय क्या तुम्हें पता है, तुम रोज मेरे ख्वाबों में आते हो, पूरी रात हाथों में हाथ लिए मंद मंद मुस्कराते रहते हो लेकिन जब मेरी ब्रह्म मुहूर्त में आँख खुलती है तब तुम कहीं नहीं होते हो लेकिन तुम्हारी खुशबू से भीगा मेरा मन पूरे दिन महकता रहता है ,,,,सुखों के गीत रचता रहता है फिर क्यों होती है उदासियां ? निराशायेँ  ? नहीं पता ,,,हो सकता है यह भी तुम्हारा ही कोई खेल होता हो ...हो सकता है तुम याद करते हो इस तरह से कि दिल मेरा भर जाता है ,,,,
सुनो मेरे प्रियतम मैं एक बात कहती हूँ मुझे तुमसे कोई गिला शिकवा या शिकायत नहीं है लेकिन कुछ तो है जो मन में चुभता है,, न जाने यह क्या है जो बिसरने पर मजबूर कर देता है ..प्रिय तुम मुझसे किए वादों का मान रख लेना
कि कहीं नक्षत्र रुष्ट न हो जाएँ क्योंकि यह हमारा प्रेम सिर्फ उनकी ही देन है उनका ही आशीष है ,,,जो प्रतिपल हमें आशीषों से नबाजते हुए निरंतर उत्क्रष्टता प्रदान करते चले जा रहे हैं ,,, 
दिल की दीवारों पर तस्वीर सजा दी है 
आँखों के दरवाजे पर छवि बसा दी है 
हर तरफ बस तुम ही तुम हो प्रिय 
यही मैंने अपनी तकदीर बना ली है!!
क्रमशः 
सीमा असीम                   

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