गतांक से आगे
सुनो प्रिय
, कल रात चले आए तुम मेरे ख्वाबों में सकूँ तलाशने मैं खुश थी यूं तुम्हें अपने इतने करीब देखकर और तुम कुछ परेशान थके हुए,बीमार और दुखी से लगे थे ,,,प्रिय तुम क्या जानते नहीं हो यह दुनियाँ है यहाँ सब दर्द देना जानते हैं उसे बढ़ाना जानते है लेकिन कोई भी ऐसा नहीं मिलेगा जो आपको जान सके समझ सके आपकी परेशानियाँ कम कर सके क्योंकि प्रिय यही तो दुनियाँ है यही इसका दस्तूर है और यही इसका नियम है ,,तो क्यों अपना दिल दुखाना ,,क्यों दर्द में डूब जाना ,, प्रिय आओ मेरा हाथ पकड़ों अब और चलो उस अनंत आकाश में विचरण करे जहां चाँद अपना द्वार खोले बैठा है सितारों से सजा हुआ उसका आँगन हमारी अगुआई करने को खड़ा है कस कर पकड़ना मेरा हाथ कहीं तुम गिर न जाओ, फिसल न जाओ ,,,मुझे पता है कि तुम संभल कर नहीं चल पाते हो, हर राह पर अपने कदम बढ़ा देते हो ,,,,नहीं यह सही नहीं है बहुत खराब हैं रास्ते ,,ऊंचे नीचे ऊबड़ खाबड़ ,,,,,,यूं बेपरवाह रहना सही नहीं है और जो सही नहीं है वो गलत है सिर्फ गलत ...पता है प्रिय जब तुम मेरे ख्वाबों में आते हो, अपने दुख को कम करने तब मैं सोचती हूँ अब मैं अपने दर्द किसे कहूँगी लेकिन फिर खयाल आता है कि यह गम ही तो हैं जो हमें आपस में जोड़े रहते हैं ,,,इस कदर जोड़े हैं कि हमें फिर फिर आपस में मिला देते हैं... मैं तो हर पल हर स्वांस में सिर्फ तुम्हारी ही हूँ कभी भी देखना कभी भी पुकारना लेकिन प्रिय देखना यह दुनियाँ हमें हमेशा दूर करने के नए तरीके खोज लेती है लेकिन हमारा सच कभी भी हमें किसी भी दीवार से टकरा जाने की हिम्मत दे देता है ,,,,मेरा दर्द कम करके खुशबू बिखेर देता है प्रेम की, सच से भरे सच्चाई की राह पर चलते सच्चे प्रेम की खुशबू ही मन भावन होती है ,,,भिगो देती रोम रोम मन को शीतलता प्रदान करते हुए क्योंकि सच्चा और दिव्य प्रेम कभी दुख नहीं देता वो उमंगित मन से होले होले प्रेम से सहला देता है प्रेम की पीर को ॥ धीरे से पुकार लेता है अपने प्रिय को और उसके दुख को अपना दर्द बना लेता है ....
महक उठा उमंगों से भरा मेरा मन आज क्योंकि ख्वाबों में में ही सही तुम सब कह गए अपने सारे दर्द ,,बाँट लिए हमने आपस में अपने गम अब कोई शिकवा ही नहीं,, मुझे शिकवा तो पहले भी नहीं था, न कोई शिकायत थी बस एक तकलीफ थी जो भीतर ही भीतर कुरेदती रहती थी कि कभी तुम भी तो अपने सारे गम मुझसे कह लो बाँट लो सब कुछ ,,,समझ के अपना और तुमने मुझे अपना समझा ,,,तुम पहले से ही समझते थे यह बात आज मैंने जानी जब तुम आकर आज सब कह गए अपने सुख और दुख ,,,,
मैं मुस्कराई हूँ इसलिए कि मेरे लब की हँसी खुशी तुम्हारे लब पर भी आए ....लो थामे रहो अब यूं ही मेरा हाथ कि खुशियाँ संग हैं मेरे साथ हैं सदा ,,
क्रमशः
सीमा असीम
सुनो प्रिय
, कल रात चले आए तुम मेरे ख्वाबों में सकूँ तलाशने मैं खुश थी यूं तुम्हें अपने इतने करीब देखकर और तुम कुछ परेशान थके हुए,बीमार और दुखी से लगे थे ,,,प्रिय तुम क्या जानते नहीं हो यह दुनियाँ है यहाँ सब दर्द देना जानते हैं उसे बढ़ाना जानते है लेकिन कोई भी ऐसा नहीं मिलेगा जो आपको जान सके समझ सके आपकी परेशानियाँ कम कर सके क्योंकि प्रिय यही तो दुनियाँ है यही इसका दस्तूर है और यही इसका नियम है ,,तो क्यों अपना दिल दुखाना ,,क्यों दर्द में डूब जाना ,, प्रिय आओ मेरा हाथ पकड़ों अब और चलो उस अनंत आकाश में विचरण करे जहां चाँद अपना द्वार खोले बैठा है सितारों से सजा हुआ उसका आँगन हमारी अगुआई करने को खड़ा है कस कर पकड़ना मेरा हाथ कहीं तुम गिर न जाओ, फिसल न जाओ ,,,मुझे पता है कि तुम संभल कर नहीं चल पाते हो, हर राह पर अपने कदम बढ़ा देते हो ,,,,नहीं यह सही नहीं है बहुत खराब हैं रास्ते ,,ऊंचे नीचे ऊबड़ खाबड़ ,,,,,,यूं बेपरवाह रहना सही नहीं है और जो सही नहीं है वो गलत है सिर्फ गलत ...पता है प्रिय जब तुम मेरे ख्वाबों में आते हो, अपने दुख को कम करने तब मैं सोचती हूँ अब मैं अपने दर्द किसे कहूँगी लेकिन फिर खयाल आता है कि यह गम ही तो हैं जो हमें आपस में जोड़े रहते हैं ,,,इस कदर जोड़े हैं कि हमें फिर फिर आपस में मिला देते हैं... मैं तो हर पल हर स्वांस में सिर्फ तुम्हारी ही हूँ कभी भी देखना कभी भी पुकारना लेकिन प्रिय देखना यह दुनियाँ हमें हमेशा दूर करने के नए तरीके खोज लेती है लेकिन हमारा सच कभी भी हमें किसी भी दीवार से टकरा जाने की हिम्मत दे देता है ,,,,मेरा दर्द कम करके खुशबू बिखेर देता है प्रेम की, सच से भरे सच्चाई की राह पर चलते सच्चे प्रेम की खुशबू ही मन भावन होती है ,,,भिगो देती रोम रोम मन को शीतलता प्रदान करते हुए क्योंकि सच्चा और दिव्य प्रेम कभी दुख नहीं देता वो उमंगित मन से होले होले प्रेम से सहला देता है प्रेम की पीर को ॥ धीरे से पुकार लेता है अपने प्रिय को और उसके दुख को अपना दर्द बना लेता है ....
महक उठा उमंगों से भरा मेरा मन आज क्योंकि ख्वाबों में में ही सही तुम सब कह गए अपने सारे दर्द ,,बाँट लिए हमने आपस में अपने गम अब कोई शिकवा ही नहीं,, मुझे शिकवा तो पहले भी नहीं था, न कोई शिकायत थी बस एक तकलीफ थी जो भीतर ही भीतर कुरेदती रहती थी कि कभी तुम भी तो अपने सारे गम मुझसे कह लो बाँट लो सब कुछ ,,,समझ के अपना और तुमने मुझे अपना समझा ,,,तुम पहले से ही समझते थे यह बात आज मैंने जानी जब तुम आकर आज सब कह गए अपने सुख और दुख ,,,,
मैं मुस्कराई हूँ इसलिए कि मेरे लब की हँसी खुशी तुम्हारे लब पर भी आए ....लो थामे रहो अब यूं ही मेरा हाथ कि खुशियाँ संग हैं मेरे साथ हैं सदा ,,
क्रमशः
सीमा असीम

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