गतांक से आगे
जो कह देते हो बस वही मान लेती हूँ 
रब से खुशियों की दुआ मान लेती हूँ 
धड़कनों संग धड़कने वाले मेरे प्रिय 
चाँद तारों में भी तुम्हें निहार लेती हूँ !!
सुनो प्रिय, 
             आज अचानक से आसमां की तरफ नजर उठ गयी थी उस जाम में फंसे हुए ...अरे यह क्या तुम कैसे चाँद के बीच में नजर आ गए उस पतले से अर्धचंद्राकार चाँद में खड़े खड़े मुस्करा रहे थे मैं तो तुम्हें नजर भर के देखना चाहती लेकिन कहीं मेरी नजर न तुम्हें लग जाये यह सोचकर मैंने अपनी आँखें बंद कर ली .....और तब तुम मेरे मन में उतर आए मैं तुम्हें फिर कनखियों से झाँकने लगी ........मेरे प्रिय, मेरे प्यारे प्रियतम अब तो हर खुशी तुमसे ही है, जिंदगी भी तुम, बंदगी भी तुम, जान भी तुम और जहां भी तुम .......प्रिय मैं सोचती हूँ कि अब जब मिलन के दिन करीब आ रहे हैं, तब हम तुम्हें कैसे बता पाएंगे कि हमने कैसे दिन गुजारे ? हम कैसे पलछिन तुम्हें नाम लेकर मन ही मन मनका की तरह फेरते रहे ? हम तुम्हें याद कर कर के इतना रोये कि मेरी आँखों में सिंदूरी लालिमा से भर गयी ? जब कभी सोये तो इसलिए कि तुम मेरे ख्वाबों में संग रहोगे ........ खाना जिसे देखकर अरुचि सी उत्पन्न हो गयी .....कैसे बताएँगे प्रिय तुम्हें कि हर जगह तुम्हें पा जाते थे और गौर से देखने पर तुम गायब हो जाते थे ......कैसे कहूँगी तुमसे कि कभी तकिये को गले लगाकर तो कभी दरवाजे को लिपट कर हमने अपने आँसू बहाये ......बादल घिर घिर के आए घिरे और बिना बरसे भी चले गए कई बार .....गर्मियों के लंबे लंबे दिन कितना सताते रहे, बेकाबू धड़कनों को किस तरह से हम संभालते रहे .......और ये सर्दियों की रातें हम कभी तारे गिनकर, तो कभी रात भर तुम्हें कागज पर उकेरते हुए गुजरते रहे .....प्रिय मैं नहीं समझ पाती हूँ क्या तुम्हें पता है ? कैसे वयाँ कर पाएंगे हम अपनी बातें .....हम शायद कुछ कह ही नहीं पाएंगे हम सिर्फ तुम्हें देखकर मुस्करा देंगे ...हाँ प्रिय उस वक्त हम तुम्हें अपने लबों पर सजा लेंगे ॥और आँचल की तरह अपने तन पर लपेट लेंगे .....पता है प्रिय, हम कुछ कह ही नहीं पाएंगे, कुछ भी नहीं, बस अपनी धड़कनों को साथ साथ धड़काते हुए हवा से बातें करेंगे ....हमारी साँसे भी भीगी हुई होंगी और हमारी आँखें भी भीगी भीगी .....मेरे मन का प्रकाश जो मुझे अंधेरे में भी रोशन रखता है वो हर तरफ बिखर जाएगा ...मेरी वफाओं के गीत गूंजने लगेंगे और उस सच्ची वफा की खुशबू से तरबतर हो जाएँगे .....भीगा भीगा और नम नम सा अहसास होगा वो अहसास जो मैं हर समय महसूस करती हूँ ....यह मौन जो मेरे मन के कोने कोने में उतार आया है प्रिय यह मेरा नहीं बल्कि मेरा प्रेम है जिससे मैं लबालब भर गयी हूँ .......इसे अब किसी भी तरह से और पूरी तरह से न कहा जा सकता है, न जताया जा सकता है, न बताया जा सकता है और न ही उकेरा जा सकता है ,,, सिर्फ उड़ेला जा सकता .....लौटा जा सकता है....भरा जा सकता है ....कि यह मेरा मौन ही मेरी प्रेम की भाषा बन गया है ...प्रिय क्या तुम यह समझते हो ? क्या तुम यह जानते हो ?
प्रिय तुम हर समय ही मेरे करीब हो ...हर जगह तुम ही तुम हो ...आकाश, धरती, हवा, जल, अग्नि और मेरी आत्मा, मेरी रूह भी तुम ही हो ....जड़, चेतन, सोने और जागने में भी ....तभी तो जब मैं अचानक से यूं ही मुस्करा देती हूँ तो लोग समझते हैं क्या है इसके मन में ? क्या पा लिया है इसने ? प्रिय आईना देखते समय तुम ही तो नजर आते हो, मैं कहीं होती ही नहीं, बताओ प्रिय, अब तुम ही बताओ ? खुद को कहाँ देखें ? कहाँ पाऊँ ?कहाँ निहारू ? प्रिय सच तो यह है कि मैं तुम्हारे अस्तित्व में ही कहीं समा गयी हूँ ...... 
जिधर देखती हूँ तुम ही तुम 
मैं तो कहीं बची ही नहीं ......क्रमशः 
सीमा असीम

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