गतांक से आगे
आज तुम खुद चले आए थे सपने में पूछने क्यों हो उदास
हूँ मैं कहीं भी दूर या पास रहता हूँ मैं हरदम तेरे आसपास !!
सुनो प्रिय,
जब तुम्हारे इंतजार में मेरी आँखें थक गयी तो मैं लिखने लगी एक प्रेम कविता ,,कुछ फूल ,कुछ पत्तियों और चाँद, तारे, आसमां, जमीं पर लिखा लेकिन प्रिय मेरा मन इन चीजों में बिलकुल भी नहीं लगा क्योंकि मेरा मन तो अटका रहता है तुम में ही ,,पता नहीं क्या खाया होगा ? पता नहीं कैसे समय बिताया होगा ? पता नहीं सुख की नींद आई भी होगी या नहीं ? इस सर्द मौसम में कहीं सर्दी न लग जाये ,,,ऐसे ही तमाम बातें मुझे परेशान करती रही ,,,मेरे प्रिय क्यों चले जाते हो ? क्यों इतना कष्ट देते हो खुद को ? क्यों नहीं करते हो खुद की जरा सी भी परवाह ? पता है आजकल मौसम बहुत सर्द है,दिन छोटे छोटे और रातें बहुत लंबी ,,कोहरे भरा आसमान एकदम से धुंधला जाता है ,,,मेरी आँखें उस समय तालाश रही होती हैं चाँद कि आँख बहने लगती हैं ,यह आँसू नहीं हैं प्रिय यह सब तो सर्द कोहरे के कारण हो रहा है ,,,नम आँखें यूं ही तो भरी भरी रहती हैं न ....यह सर्दियाँ न जाने क्यों ले आती हैं इंतजार ,,जब हम चलना चाहते हैं उन ऊँचे नीचे,टेड़े मेडे से रस्तों पर खुद में खोकर हाथों में हाथ डाले हुए उन जानी पहचानी सी सड़कों पर ,,,जहां जुगनुओं की टिम टिम टिमाती रोशनी हो, दूर तक पसरा सन्नाटा और हम जिंदगी से भरे हुए चलते चले जाये ...मन के बाबरे से ख्यालों को जीते हुए ,,गुनगुनाती हुई हवाओं के साथ और सरसराती हवाएँ कह जाती हो कानों में चुपके से क्यों ताकते हो आँखों ही आँखों में एकदूसरे को ?? लफ्जों, हर्फों के बिना ही हम तोड़ लेंगे खामोशियाँ... प्रिय क्या तुम्हें बागों में खिले उन फूलों की खुशबू अपनी ओर नहीं खींचती ...जहां धूनी रमाये देव हमारे इंतजार में एक पाँव से खड़े हैं ॥देखो वे कैसे करते हैं हमारा आवाहन ....मत अनसुनी करो उनकी आवाजें जो मेरे कानों में गूँजती रहती हैं देर तलक ... वे जो लम्हें, जो बीते साथ साथ ,,,वही लम्हों की बहती नदी भिगाती रहती है मेरा मन ,,,कि आओ प्रिय भुला के खुद को ही उन लम्हों को जी ले ...मन के तारों को बांध कर करे मन की बातें ...
सुन रे मेरे मन मीत
मैं लिखती रहूँ गीत
विरह की रातो में
मेरी हार, तेरी जीत !!
क्रमशः
सीमा असीम

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