गतांक से आगे
हरपल में तुम्हें ही ताकती रहती हैं निगाहें !
कब होती है सांझ ओ सहर कुछ याद नहीं !!
सुनो प्रिय,
तुम मेरी आँखों में आंसुओं की तरह भरे रहते हो ,,,कभी आँख से छलक जाते हो और कभी भीतर उतर जाते हो और बस इसी तरह कब गुजरता है दिन, रात, सुबह, दोपहर, शाम पता ही नहीं चलता ...क्योंकि आखिर कब तक झूठी मुस्कान को मैं अपने लबों पर बिखेरती रहूँ आखिर कब तक यह झूठा अभिनय करती रहूँ ,,आखिर कब तक यह दर्द अकेले सहती रहूँ ,,,क्या तुम्हें कभी समझ नहीं आता ,,कभी भी नहीं ? सुनो प्रिय, यह जो इश्क, मोहब्बत, प्रेम होते हैं न बड़े जानलेवा होते हैं जीते जी मरे के समान ,,,न होश, न परवाह, कुछ अपना बचता ही नहीं॥ न तन, न मन कुछ भी मेरा नहीं, सब तेरा, सब कुछ तू ...सिर्फ एक तू ही तू ,,,मैं कहाँ रहता है कहीं भी तो नहीं ,,,और यह सच्चा प्रेम यूं ही तो नहीं हो जाता ...न इसे जबर्दस्ती किया जा सकता है ,,न इसे पाया या खोया जा सकता है ...हो जाता है कोई अपना ,,,बस जाता है दिल में ,,,समा जाता है रूह में ,,,नस नस में बहने लगता है ,,कोख में पलने लगता है ,,चाहें तुम मिलो न मिलो ,,चाहें तुम्हें कभी पा सकूँ या न पा सकुं कोई परवाह ही नहीं होती बस एक लगन लग जाती है मन को सच्ची श्रद्धा भरी ...आस्था से भरी हुई ,,,तुम अगर ध्यान देते हो तो ठीक नहीं देते तब भी मैं निभाती चली जा रही हूँ लेकिन मुझे इतने पता है कि अगर हमारे मन में सच्ची भावना है तो हर हाल में तुम मुझे उतना ही चाहोगे या उससे भी ज्यादा जितना मेरे मन में तुम्हारे लिए है प्रेम है ,,,प्रिय तुम भी कर लेते हो अभिनय झूठा, ,,तिलिस्मी मुस्कान लबों पर बिछाए भीतर ही भीतर कितना कुछ हारते चले जाते हो ,,न जाने कितने युद्ध अपने मन के भीतर करते रहते हो खुद से ही उबरने के लिए ,,,बंधे रहते हो बिना बंधन के भी मेरे प्रेम से ,,मुक्त होकर भी मुक्त नहीं हो पाते हो ,,दर्पण में खुद को निहारते हुए पा लेते हो मेरी छवि,, तभी तो घबरा कर पुकार उठते हो मेरा नाम ,,,सुनो प्रिय मैं तो तुम्हारे मन में ही बिचरती रहती हूँ ,,तुम्हारे दिल में ही रहती हूँ ,,,अब चाहें जैसे रखो सब स्वीकार है बिना किसी शिकवे या शिकायत के ,,,प्रिय मैं तुम्हारी आँखों में इस कदर समा गयी हूँ कि तुम किसी को भी देखो मुझे ही पा लेते हो ,,,प्रियतम यह सच्चे प्रेम का नूर है और मेरी सच्ची इबादत का असर जो मेरे चेहरे से चमकता हुआ तुम्हारे चेहरे पर खिला रहता है ,,यह सच है और सिर्फ यही एक सच है हमारे प्रेम का ,,,तभी तो हम जितना भी दूर रहने की कोशिश कर लें हम और भी ज्यादा करीब आते चले जाते हैं ,,,बेहद करीब ,,देखो न प्रिय आज का सूरज कितना चमकदार है सर्द दिन की कोहरे भरी धुंध न जाने कहाँ बिला गयी है ,,उमंगों के अनगिनत रंग हमारी रूह में भर गए हैं जो रोते हुए भी लबों को मुस्कराने पर मजबूर कर देते हैं ...सुनो प्रिय जब हमारी कलम तुम्हें शब्द दर शब्द उकेरती है तो हम उसे चाह कर भी रोक नहीं पाते वो यूं ही चलती चली जाती है या यूं कहे फिसलती चली जाती है सच्चाई की चिकनी राह पर ,,,
जब आँखों से आँख मिली नजर चौंधियां सी गयी
कोई जादू या था वशीकरण बस तेरा बना गयी .....क्रमशः
सीमा असीम !!

Good .loved it...
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