गतांक से आगे
न नींद आए न करार दिल को आए
चुपके से आकर वे प्रेम गीत सुनाये !
सुनो प्रिय
आज चाँद के संग संग तुम चले आए मैं निहारती रही उस चाँद को देर तलक अपनी भाव बिव्हल आँखों को खोलते और बंद करते हुए .....कितनी ही बातें मन ही मन में उससे कर डाली प्रिय यह चाँद तुम्हारी छवि में तब्दील हो जाता है और आकर बैठ जाता है मेरी खिड़की के मुहाने पर .....मैं शरमा जाती हूँ और वो मंद मंद मुस्कराता रहता है ..उस समय सारा संसार चैन की नींद सोया रहता है और हम दोनों एक दूसरे का साथ निभाते हुए जागते रहते हैं ..दिल का दर्द कम होने लगता है .सुनो प्रिय जब तुम मुस्कराते हो दिल सुकु से भर जाता है , तब न जाने दिल की बेचैनी कहाँ चली जाती है ,,न जाने कहाँ से करार आ जाता है और मैं हल्की हल्की सी होकर हवा से बातें करने लगती हूँ पाँव जमीं पर टिकते ही नहीं..गीत लबों पर थिरक उठते हैं ....लेकिन सूर्य निकलते ही कैसे तन्हा तन्हा कर जाता है ......
प्रिय मुझे आज तुम बहुत याद आए बहुत ही ज्यादा, मैं तुम्हारी हुड़क से सुबक सुबक के रो पड़ी, मेरे आंसुओं को शायद इंतजार रहता है मेरे गालों को चूमते हुए कंठ तक उतर आने का,,,,, प्रिय तुम हो तो चैन है करार है खुशी है ....तुम्हारे होने से ही मेरे मन का उपवन खिला रहता है ,,,,मेरी राहें रोशन रहती हैं ...ओ मेरे मेहरवा इस स्वार्थी दुनियाँ के तुम ही मेरे सच्चे साथी हो ....मैंने खुद को तुम पर हार दिया है, वार दिया है और सौंप दिया है .... अब जिस विधि तुम रखोगे मैं रह लूँगी बिना किसी शिकवे गिले के क्योंकि जिसमें तेरी रज़ा, उसमें मेरी रज़ा !! सुख दोगे तो खुश हो लूँगी और दुख दोगे तो रो लूँगी .... मैं तुमसे पल भर को भी जुदा नहीं हूँ ,मेरावजूद ही अब तुमसे है सुनो प्रिय यह न जाने कैसा रिश्ता बन गया है कि पल भर की दूरी भी असहयनीय लगती है ...इसीलिए मैं खुद को हर वक्त में तुम में रमाए रहती हूँ ,,और रब से दुआ करती हूँ कि मेरा कोई भी लम्हा तुम्हारे बिना न गुजरे ,मेरी हर सांस तुम्हारा नाम यूं ही दोहराती रहे...तुम्हारे लिए ही जीऊँ और तुम्हारे लिए ही मर जाऊँ ...अपनी वफा से तुम्हारे प्रेम को सहेजे रहूँ दिल में छुपाए रहूँ और तुम्हारी खुशी पर निसार हो जाऊँ ,फना हो जाऊँ ...सुनो मेरे प्यारे प्रियतम सूर्य ने नव प्रभात का का राग लिखना शुरू कर दिया है ,,,हल्की सी चहल पहल शुरू हो गयी है, सर्द दिन की सुबह थोड़ी अलग सी होती है लोग जागते हुए भी अलसाए रहते हैं ,,,प्रिय मैं अभी तक तुम्हारी यादों की बाहों के आरलिंगन में कैद हूँ चाँद तो न जाने कब का खिड़की से हटकर चला गया है , तुम्हारे छुअन की सिहरन को मन में सहेजे यूं ही सोते जागते रातों को गुजार देती हूँ ,,,खुद को तुम्हारे हवाले कर के तुम्हारे होठो पर मधुर मुस्कान बन के बिखरी रहती हूँ ......और यूं ही बिखरी रहना चाहती हूँ तुम्हारे लबों पर हमेशा तुम्हें खुशियों से नवाजते हुए ......
ओ मेरे दिलवर, ओ मेरे रहवर, ओ मेरे रहनुमा
अब ऐतवार तुम पर खुद से ज्यादा हो गया है.....क्रमशः
सीमा असीम

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