गतांक से आगे
पल तो गुजरते नहीं और दिन गुजरते चले जाते हैं !
आपकी याद और आप यूं साथ निभाते चले जाते हैं !!
सुनो प्रिय,
             जब मुझे कोई दुख या दर्द परेशान करता है तब मैं न चाहते हुए भी तुम्हें आवाज लगा देती हूँ अनजाने में ही ,,मैं उस वक्त चाहती हूँ प्रिय तुम्हारे कंधे पर अपना सर रखकर सब कुछ कह देना और खुद को हल्का कर देना लेकिन मैं खामोशियों को ओढ़ लेती हूँ और बहा देती हूँ अपनी आँखों से सारा दर्द क्योंकि तुमसे कहकर तुम्हारे दर्द को बढ़ा देना शायद मुझे अच्छा नहीं लगता है इसीलिए सह लेती हूँ वे सारे गम, दर्द, दुख अकेले ही जो मुझे तुमसे बांटने होते हैं ...पता है प्रिय तुम्हारे कंधे पर  टिका हुआ मेरा सर मुझे अहसास देता है तुम्हारे होने का जैसे मेरी प्रेम भरी पुकार को सच्चे विश्वास का आश्रय मिल गया हो ...मेरा विश्वास तो तुम ही हो प्रिय सिर्फ तुम्हारा विश्वास ही है जो तुम्हारी हर बात मानने को मजबूर हो जाती हूँ और यह कहने को भी जैसी तुम्हारी मर्जी या जैसा तुम कहोगे सब मान लूँगी क्योंकि तुमसे बढ़कर कुछ भी नहीं है न मेरे लिए  ....
जैसे धरती को मिल जाता है आश्रय आकाश का, दीपक को ज्योति का ठीक वैसे ही तुम्हारा होना भर ही मुझे मेरे अस्तित्व के प्रांगण में महसूस हो जाना होता है ॥ और तुम्हारा होना भर ही मेरे बहते दर्द का संबल बन जाता है ...आसुओं का क्या है यह तो यूं ही बहते रहते हैं ...

सुनो मेरे प्रिय किसी पवित्र समिधा की तरह मैं खुद को यूं ही प्रेम की अग्नि में तपाती रहूँगी ,,,अनवरत बिना कुछ कहे, बिना कुछ बोले ....कहाँ कह पाऊँगी कभी तुमसे मैं तुम्हारी ही शिकायतें ....इसी तरह बिता दूँगी अपना सारा वक्त युग युगांतरों तक दिन रात तुम्हारे नाम का मन ही मन सुमिरन करते हुए ...कब गुजर जाता है मेरा समय पता भी कहाँ चलता है  .....एक साध है एक आस है और ताप है मेरे प्रेम की कि कभी तुम्हारी किसी भी खुशी में मैं बाधा न बनूँ किसी भी तरह से.....देखो प्रिय यह कोहरे भरी सर्द रात भी कितनी गुनगुनी सी हो गयी है ॥अंधेरा प्रकाश में तब्दील हो गया है ... कहीं दूर दूर तक निराशा का कोई बादल ही नहीं है ...देखो कैसे इंद्र्धनुषी रंग हर तरफ बिखर रहे हैं मानों नजदीक आ रही है घड़ी खुशियों की ....सारे गम दर्द और दुखों को दूर करने की ........
गम को झटक खुशियों की गली में  जाती हूँ 
तुम्हारी बाहों में सिमट कर सकूँ पा जाती हूँ 
टिका कर कांधे पर तुम्हारे मैं अपना सर 
हाथों में हाथ डाले बस चलती चले जाती हूँ !!
 हमारा प्रेम बस तुम्हारा विश्वaस ही है जो दूर रखता है उन सब तकलीफ़ों से जो मुझे कभी महसूस होती हैं .....क्रमशः 
सीमा असीम

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