गतांक से आगे
दर्द की रात है खामोशी से गुजर जाने दो !
नूर ए सहर आएगी, नूर ए सहर आएगी !!
सुनो प्रिय,
मेरा रोम रोम तप करता है, प्रेम अगन में तपता रहता है ,,,,मेरे अश्रु पिघल पिघल कर आँखों से बहते रहते हैं,,, क्या तुम जानते हो ? यह प्रेम जो मेरी तपस्या बन गया है, इसे किस तरह से भंग किया जा सकता है ? नहीं प्रिय, इसे कोई नहीं तोड़ सकता, तुम भी नहीं, कभी नहीं ....मेरा पवित्र प्रेम मेरी तपस्या है जो मैं एकाग्र मन से किए जा रही हूँ ! अपने प्रेम का दिया जलाए, तुमसे मिलने की आस लिए सारी दुनियाँ से बेपरवाह बेफिक्र हो गयी हूँ ,,,तुम साथ हो, मेरे हर पल में, मेरी हर तपस्या में, मेरे रोम रोम में, मेरे लहू में फिर यह कैसी बेचैनी सी मन में भर जाती है ? उदास कर जाती है और आँखों से अश्रु बहाती है ,,,प्रिय क्या तुम परेशान हो ? क्या तुम उदास हो ? क्या तुम बेचैन हो ? सुनो मेरे प्रियतम मैं तो तुम्हारे दिल में ही हूँ , मैं तुम्हारी आँखों मे हूँ, सुनो प्रिय मैं कहीं भी रहूँ, मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूँ ,,सुख दुख, गम दर्द या किसी भी तकलीफ में ,,,तुम महसूस करो ,, तुम अहसासों में भरो ,,मैं हर वक्त तुमसे बिना बोले भी बात करती हूँ ,,साये की तरह साथ रहती हूँ ,,,मेरा हर पल तुम्हारा ही तो है सिर्फ तुम्हारा ,,,,हाँ सिर्फ तुम्हारा ही तो है प्रिय ,,,मेरी दुआएं तुम्हारे लिए ही तो होती हैं ,,मैं अपने हाथ उठाकर रब से दुआ मांगती हूँ कि उदासी दूर कर दो कि दामन खुशियों से भर दो ... कभी गम न आए, अगर कभी आ भी जाये तो मुस्करा के निकल जाये ,,, प्रिय मैं हर तरह से हर रूप में ढल जाती हूँ ,,,मैं स्वयं को हर तरह से तुम्हारे अनुकूल बना लेती हूँ कि कही तुम्हें कोई दर्द, कोई तकलीफ छु भी न पाये ...तो यह कैसी उदासी ,,, यह कैसा दर्द ॥ यह कैसी याद ॥ यह कैसी तनहाई .... कैसी जुदाई ,,,,प्रिय सुनो, तुम तो मेरे लबों की मुस्कान बन गए हो ,,,बैठे रहते हो यूं ही मुस्कराते हुए,, बिना बोले ,, बिना कुछ कहें ,,,,यह महकती हवाएँ, जब तुम्हारा संदेश लेकर आती हैं तो मेरा प्रेम से छलक्ता हुआ मन महक उठता है, मैं तब गुनगुनाती हूँ प्रेम गीत और हमारे संग संग गाने लगती हैं दुनियाँ की सारी प्रकृति झूम झूम कर मदमस्त होकर ,,,,तो अब तुम ही बताओ हम दूर रहकर भी दूर कहाँ हैं ? कैसे हैं जब तुम मेरे मन में बसे हो, तो कैसी दूरी ? हम यूं ही मिले रहेंगे सदियों तक ,,,बसे रहेंगे एक दूसरे के मन में और हमारा गवाह रहेगा हमारे मिलन का साक्षी वो क्षितिज, जिसने हमें मिलाया ,,,, जिसने हमारी सदियों की साध पूरी की ,,,, जिसने हमारी तपस्या को आशीष दिया ,, वरदान दिया ,,,क्योंकि यूं ही तो कोई नहीं मिल जाता और मिल भी जाये तो कभी साथ नहीं चल पाता ठिठक जाता है सभालते सभलते ,,,
मेरा प्रेम न कभी थमा न ठिठका न पल भर को रुका बस लीन है तपस्या में ,,,मेरे मन के निर्जन में फूल खिलते रहे और खिलते रहेंगे यूं ही सदा मैं इन्हें अपने अश्को से सीचती रहूँगी और इसकी मनभावन खुशियों से तर होकर प्रिय तुम्हें अपने अहसासों से हर पल महकाती रहूँगी, हाँ मेरे प्रिय मैं तुम्हें यूं ही महकाती रहूँगी ,,,
मेरा मन नहीं मानता कोई भी बाधा ,नहीं जानता कोई रुकावट
हम साथ हैं सदा ,,हम साथ हैं सदा कि मैंने रूह में बसाया है तुम्हें !!
क्रमशः
सीमा असीम
दर्द की रात है खामोशी से गुजर जाने दो !
नूर ए सहर आएगी, नूर ए सहर आएगी !!
सुनो प्रिय,
मेरा रोम रोम तप करता है, प्रेम अगन में तपता रहता है ,,,,मेरे अश्रु पिघल पिघल कर आँखों से बहते रहते हैं,,, क्या तुम जानते हो ? यह प्रेम जो मेरी तपस्या बन गया है, इसे किस तरह से भंग किया जा सकता है ? नहीं प्रिय, इसे कोई नहीं तोड़ सकता, तुम भी नहीं, कभी नहीं ....मेरा पवित्र प्रेम मेरी तपस्या है जो मैं एकाग्र मन से किए जा रही हूँ ! अपने प्रेम का दिया जलाए, तुमसे मिलने की आस लिए सारी दुनियाँ से बेपरवाह बेफिक्र हो गयी हूँ ,,,तुम साथ हो, मेरे हर पल में, मेरी हर तपस्या में, मेरे रोम रोम में, मेरे लहू में फिर यह कैसी बेचैनी सी मन में भर जाती है ? उदास कर जाती है और आँखों से अश्रु बहाती है ,,,प्रिय क्या तुम परेशान हो ? क्या तुम उदास हो ? क्या तुम बेचैन हो ? सुनो मेरे प्रियतम मैं तो तुम्हारे दिल में ही हूँ , मैं तुम्हारी आँखों मे हूँ, सुनो प्रिय मैं कहीं भी रहूँ, मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूँ ,,सुख दुख, गम दर्द या किसी भी तकलीफ में ,,,तुम महसूस करो ,, तुम अहसासों में भरो ,,मैं हर वक्त तुमसे बिना बोले भी बात करती हूँ ,,साये की तरह साथ रहती हूँ ,,,मेरा हर पल तुम्हारा ही तो है सिर्फ तुम्हारा ,,,,हाँ सिर्फ तुम्हारा ही तो है प्रिय ,,,मेरी दुआएं तुम्हारे लिए ही तो होती हैं ,,मैं अपने हाथ उठाकर रब से दुआ मांगती हूँ कि उदासी दूर कर दो कि दामन खुशियों से भर दो ... कभी गम न आए, अगर कभी आ भी जाये तो मुस्करा के निकल जाये ,,, प्रिय मैं हर तरह से हर रूप में ढल जाती हूँ ,,,मैं स्वयं को हर तरह से तुम्हारे अनुकूल बना लेती हूँ कि कही तुम्हें कोई दर्द, कोई तकलीफ छु भी न पाये ...तो यह कैसी उदासी ,,, यह कैसा दर्द ॥ यह कैसी याद ॥ यह कैसी तनहाई .... कैसी जुदाई ,,,,प्रिय सुनो, तुम तो मेरे लबों की मुस्कान बन गए हो ,,,बैठे रहते हो यूं ही मुस्कराते हुए,, बिना बोले ,, बिना कुछ कहें ,,,,यह महकती हवाएँ, जब तुम्हारा संदेश लेकर आती हैं तो मेरा प्रेम से छलक्ता हुआ मन महक उठता है, मैं तब गुनगुनाती हूँ प्रेम गीत और हमारे संग संग गाने लगती हैं दुनियाँ की सारी प्रकृति झूम झूम कर मदमस्त होकर ,,,,तो अब तुम ही बताओ हम दूर रहकर भी दूर कहाँ हैं ? कैसे हैं जब तुम मेरे मन में बसे हो, तो कैसी दूरी ? हम यूं ही मिले रहेंगे सदियों तक ,,,बसे रहेंगे एक दूसरे के मन में और हमारा गवाह रहेगा हमारे मिलन का साक्षी वो क्षितिज, जिसने हमें मिलाया ,,,, जिसने हमारी सदियों की साध पूरी की ,,,, जिसने हमारी तपस्या को आशीष दिया ,, वरदान दिया ,,,क्योंकि यूं ही तो कोई नहीं मिल जाता और मिल भी जाये तो कभी साथ नहीं चल पाता ठिठक जाता है सभालते सभलते ,,,
मेरा प्रेम न कभी थमा न ठिठका न पल भर को रुका बस लीन है तपस्या में ,,,मेरे मन के निर्जन में फूल खिलते रहे और खिलते रहेंगे यूं ही सदा मैं इन्हें अपने अश्को से सीचती रहूँगी और इसकी मनभावन खुशियों से तर होकर प्रिय तुम्हें अपने अहसासों से हर पल महकाती रहूँगी, हाँ मेरे प्रिय मैं तुम्हें यूं ही महकाती रहूँगी ,,,
मेरा मन नहीं मानता कोई भी बाधा ,नहीं जानता कोई रुकावट
हम साथ हैं सदा ,,हम साथ हैं सदा कि मैंने रूह में बसाया है तुम्हें !!
क्रमशः
सीमा असीम

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