गतांक से आगे 
बेसबब बेचैनी से दिल भरा भरा सा रहा पूरे दिन 
पीर ऐसी उठी कि आँख छलकी छलकी सी रही !!
सुनो प्रिय, 
             जो मैं तुम्हें लिखती हूँ सर्द रातों के अंधेरे में अपना चमक बिखेरता हुआ प्रेम, कभी कभी ये मुझे गम के आगोश में भर देता है और मैं बेचैन होकर घबराई हुई सी फिरती हूँ, घर बाहर कहीं भी सकूँ नहीं आता है ,,,कहीं भी मन को तसल्ली नहीं मिलती है ...खुद को भूलकर, साँसे लेना छोड़कर मैं जीने लगती हूँ तुम्हें, लेने लगती हूँ साँसे तुम्हारे नाम की, यूं तो खुशी में भी ऐसा होता है तब प्रेम छलका छलका सा रहता है हर तरफ खुशी का अहसास कराता हुआ बिखरा बिखरा सा ...गाता हुआ और झूमता हुआ सा लेकिन उदासी में ऐसा क्यों होता है ? क्यों होता है ऐसा मेरे प्रिय,
 उस वक्त मैं तोड़ देना चाहती हूँ सारी रस्में और आसमा के पार जाकर तुम्हारे आगोश में सिमट जाने को उतावली हो उठती हूँ ,,,,,,अपना मुंह तुम्हारे वक्ष में छिपा कर जी भर के अपना मन हल्का करना चाहती हूँ ....क्या तुम जानते हो प्रिय यह दिल की आवाज है और सच्चाई से निकलती है इसमें कोई मिलावट  कैसे हो सकती है ? कैसे कोई गलती हो सकती है रूह से पाक तो कुछ भी नहीं होता ....उसी पाक रिश्ते से ही मैंने अपने प्रेम की डोर बांधी है ...कोई लाख तोड़े मरोड़े ...दर्द तो देती है बेइंतिहा बेसबब लेकिन उस डोर पर कोई हल्की सी खरोंच भी नहीं आने देती ....सह लेती हूँ असहनीय पीड़ा अपने भीतर ही भीतर ....
प्रिय जब रात को अंधेरे की स्याही से लिखती हूँ शब्द दर शब्द प्रेम, तो वो अनेकों रंगों में तब्दील होकर मुझे रंगों से सराबोर कर देते हैं, प्रिय सुनो ये कभी फूलों की खुशबू सा महकाते रहते हैं कभी तारों की तरह टिमटिमाते हुए मुझे रोशन किए रहते हैं ...कभी मुस्कराते लबों पर गीत और कभी उदास नजरों से आँसू बहा देते हैं ...कभी धड़कती हुई धड़कनों को बेकाबू कर बेचैनी से भर देते हैं ॥
मेरे प्यारे प्रियतम मुझे तुमसे बस इतना सा ही प्रेम है कि मेरी सांस तुम हो ॥मेरी धड़कन तुम हो ...तुम हो तो हम हैं नहीं तो न मैं हूँ न मेरा जीवन है ...तुम्हारा होना भर ही मुझे जीने की इजाजत दे देता है ....
सुनो प्रिय मैंने लिखना चाहा था तुम्हारा नाम अपनी हथेली पर और उकेर दिया था मेंहदी से अपनी हथेली पर ...लेकिन प्रिय यह क्या और कैसे हुआ? नहीं मालूम यह जादुई करिश्मा कैसे हुआ कि तुम खुद ब खुद मेरी हथेली पर मेरी रेखाओं के बीच उकर आए हो ...... साफ साफ ....उसे अब कौन मिटा सकेगा ....उसे कोई कैसे धुंधला कर सकेगा ..... मेरा विश्वास, हाँ प्रिय मेरा अटूट विश्वास उकर आया है मेरी हथेली के बीचो बीच .......
तुमसे ही इब्तिदा है तुम ही इंतिहा हो सनम 
मुबारक रहें सदा जन्नत सी खुशियाँ सनम !!
क्रमशः 
सीमा असीम

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