गतांक से आगे
भेजी थी एक दुआ जो आसमां से टकरा गयी !आ गए वे यूं रूबरू दिल की धड़कने बढ़ा गयी !!
सुनो प्रिय
कितना घबरा गयी थी इस तरह तुम्हें देखकर इतनी खुशी मिली कि इसे शब्दों में बयां ही नहीं किया जा सकता ,,मेरे मुँह से एक शब्द भी नहीं निकल सका,तुमने भी तो कुछ नहीं कहा बस एकटक देखते ही रह गए ,,बिना पलक झपकाए अपलक ,,,,,कितनी तेज हो गयी थी दिल की धड़कनें, उन्हें संभालना कितना मुश्किल हो रहा था, नहीं देखा गया और मैंने अपनी पलकें बंद कर ली ....मेरी खुशी का कोई परावार ही नहीं था ...मेरे प्रिय उस अहसास को मैं कैसे उकेर दूँ ? नहीं चाहती चाहती उकेरना ,,,,अमेजिंग ,,,,,ओहह मेरे प्रिय चाहती थी कि ज़िंदगी यही पर थम जाये ...रुक जाये वक्त ,,,,लेकिन न तो वक्त रुका और न ही मेरे दिल की धड़कने ही रुकी ,,,,, कैसे उतावली सी हो गयी थी मैं ,,,मैं तुम्हें कसकर अपने गले लगा लेने को आतुर हो गयी थी ,,खुशी से मेरे आँसू बहने लग पड़े मैं नहीं चाहती कि तुम मेरे आंसुओं की एक बूंद भी देखो ,,भले ही वो खुशी के ही आँसू क्यों न हो ,,प्रिय मैं बहुत खुश थी बहुत ही ज्यादा ,,इतनी ज्यादा कि जमीन पर पैर ही नहीं पड़ रहे थे ...ऐसा लग रहा था जैसे मैं हवा में उढ़ रही हूँ एकदम फूल सा हल्का हो गया था तन मन ,,,,मैं उस खुशी को कभी खत्म नहीं होने दूँगी बहुत प्रेम से सहेज कर दिल में रख ली है तुम्हारी तस्वीर और बंद कर लिया दिल के दरवाजे को कि कहीं किसी की नजर न लग जाये ,,लब खुशी से खिल गए ,,,मुस्करा पड़ी मैं बेतहाशा ....बस मुस्कराती ही रही पूरे दिन ,,,कैसे संभव हुआ यह सब, एक झलक पाने को कब से बेचैन थी ,,क्या पता था मेरे मन की यह बात तुम्हारे मन तक पहुँच जाएगी ,,,,और तुम आकर इस तरह से मुझे चौंका दोगे <,,,,,,,,वैसे मेरे प्रिय आज तुमने यह चौका नहीं छक्का मारा एकदम से क्लीन बोल्ड बाउंड्री से बाहर ,,,,,प्रिय आज एक बार तुमने मेरा दिल फिर से जीत लिया और मैं हार गयी मुझे हारना अच्छा लगा ...तुम यूं ही आते रहना और मुझे यूं हरा कर खुद जीतते रहना ,,,,कैसे उबर कर आ गयी थी गहराई से निकलकर ,,,कहाँ तो मैं डूबी हुई थी लेकिन तुम्हारे क्षण भर को आ जाते ही मैं हवा में उढने लगी,,, मैं उढ़ रही थी और तुम मुझे प्रेम से सहेजे हुए थे ,,,,मेरे प्यारे प्रियतम तुम मुझे क्यों इतने प्यारे लगे ॥क्यों इतने मनमोहक ,,क्यों इतने दिल को लुभाने वाले ,,,समझ ही नहीं आया क्या करूँ ? कैसे बलाए लूँ ? कैसे निहारूँ ? मैं उस छवि को अपने दिल में बसा के अब दिन रात मुस्कराऊँगी ...सच में प्रिय मैं पल भर को भी उदास नहीं होऊँगी लेकिन क्या करूँ शाम ढलते ही सूर्य दे जाता है उदासी और चाँद तेरे इंतजार में पलकें बिछाए बस आँसू बहाने पर मजबूर हो जाती हूँ ,,,,अब तुम ही बता दो न मेरे प्रिय क्या मैं गलत हूँ ? मैंने कुछ गलत किया ? नहीं प्रिय यह मेरा सच्चा प्रेम है और इसमें कुछ भी गलत नहीं है और अगर गलत है भी तो मुझे कोई परवाह ही नहीं ,,हाँ मेरे प्रिय मुझे किसी की भी परवाह नहीं है ,,,दुनियाँ, देश, समाज, परिवार या स्वयम की भी क्योंकि मैं नहीं डरती अब किसी भी बाधा से ,,, वैसे भी सच को किसी से डरने की कोई जरूरत भी तो नहीं है ,,,मैं मरते दम तक हमेशा यूं ही तुम्हारा नाम जपती रहूँगी, तप करती रहूँगी, दुआ मांगती रहूँगी ,, इबादत करती रहूँगी और पल पल तुम्हें याद करते हुए तुम्हारा इंतजार करती रहूँगी नहीं बिसराऊँगी तुम्हें क्षण भर को भी ,,,,तुम आते रहना और दिल में बसे रहना ,,,,कभी भी न निकलने के लिए ,,,मैं पालक पांवड़े बिछाए तुम्हारा यूं ही इंतजार करती रहूँगी,, इसके लिए हर दुख सह लूँगी बिना किसी शिकवे या गिले के ,,,तुम खुश होते हो न तो मेरा मन खुशी से भर जाता है ,,,,तभी तो अपनी सारी खुशियाँ तुम पर मैं वार देती हूँ ,,
सुनो मेरे प्रिय आज मेरा जी चाहता है कि मैं रात भर तुम्हें यूं ही लिखती ,,,और गुजरती रहे यह रात तुम्हारे साथ साथ ,,,हाँ मेरे प्रिय तुम मेरे साथ हो हमेशा हो
कितना प्यार हम करते हैं सनम
यह आज हमें मालूम हुआ !
जप रही थी नाम तुम्हारा सनम
जीना यूं मेरा साकार हुआ !!
क्रमशः
सीमा असीम
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