गतांक से आगे
ये भीगा भीगा सा मन और नम नम आंखे !
डूबी रहती हूँ यादों में कि तेरी याद आती है !1
सुनो प्रिय,
तुम्हारी याद में डूबा हुआ मेरा मन यूं उदास रहता है ,,यूं अश्को से आंखे भिगोता है ,,यूं पल पल क्षण क्षण सिर्फ तुम्हें याद करता है कि साँसे चलना ही भूल जाती हैं, कभी कभी मैं सोचने लगती हूँ कि क्या मैं जीवित भी हूँ ,,,,आंखो में बस तुम और और तुम्हारी यादें बस इसके सिवाय कुछ याद ही नहीं ,,,सोते सोते भी जग जाती हूँ और जागते जागते भी सो जाती हूँ,,, वो पल जो हमने संग गुजारे किसी फिल्म की माफिक जेहन में चलते रहते हैं और यूं निकल जाता है मेरा दिन,रात , सांझ औ सहर ,,,,न जाने कब हमारे हाथो में हाथ होंगे ? न जाने कब हम रूबरू होंगे ? न जाने कब हमारे दिल साथ साथ धड़केंगे ? न जाने कब गले में डाल कर गलबहियाँ अपना सारा दर्द बहाएँगे ? न जाने कब वो घड़ी आएगी जब हब हम खुल कर मुस्कराएँगे ? खवाबों से निकल हकीकत की दुनियाँ में बसर करेंगे ? प्रिय आप आ जाओ यूं कि कभी दिल न घबराए ,,,ये भरा भरा मन तुम्हें हर पल याद करता है ,,बेइंतिहा ,बेसबब याद करता है ,,,
सुनो मेरे प्रिय ,, मैंने जो रंग भरे सपने बुने हैं,,,वो तुम्हारे संग ही तो पूरे होंगे ,,,एक एक पल की छोटी से छोटी बात मुझे याद आती है और मैं मायूसी से भरी बेनूर आँखों से इधर उधर देखती हूँ ,, प्रिय तुम तो मेरे साथ हो फिर मेरी आँखों का नूर कहाँ खो गया है ? क्यों इतना परेशान सा हो गया है ? मेरी आंखो के नूर मेरे प्रिय, यह हमारा साथ इस जन्म भर का नहीं सदियों का ,,न जाने कितनी सदियों के बिछुड़े हुए थे हम ,,,,पता है प्रिय जब कभी मेरा मन तुमसे रूठ जाता है तो खुद से मना लेती हूँ इस्सलिए कि मेरे प्रिय को तो मनाना भी नहीं आता है ,,,इतने भोले और मासूम है किसी छोटे बच्चे की तरह वे और मेरा प्रेम ...
सुनो प्रियतम मैं सोचती हूँ तो सोचती ही रह जाती हूँ कि मैंने न जाने क्या गुनाह किया था जो ये सजा मिली ,,न जाने कौन सी गलती जो मेरी हंसी खो गयी ,,,,प्रिय मैंने तो सिर्फ प्रेम ही किया सिर्फ प्रेम ,,,,जब मैं रातों को ख्वाबों से जाग जाती हूँ तो मेरा दिल तुम्हें ज़ोर से पुकार उठता है,,,कहाँ हो प्रिय,, आओ॥उस वक्त तुम न जाने कैसे मेरी आवाज सुन लेते हो और आ जाते हो, कभी ख्वाबों में आते हो और इस तरह से मुझे प्यार से बहला जाते हो कि कुछ पल को मेरे दिल का सकूँ लौट आता है ,,, मेरे मेहताब मैं रख कर तेरे सीने पर अपना सर पिघलना चाहती हूँ ,,कब तक यूं रहकर तन्हा तुम्हें याद करती रहूँ अब मैं रूबरू होना चाहती हूँ ,,,,हाँ प्रिय अब मेरे बेचैन दिल ने ज़िद ठान ली है ...तुमसे मिलने की ,,,तो आ जाओ प्रिय आओ ,,,हम साथ बैठे लेकिन तभी मेरी आँख का आँसू घबरा जाता है उस खुशी को याद करके कि हमें मिलकर फिर बिछुड्न होगा नहीं प्रिय ये हमारा अधूरा मिलन हमें और गहरे दर्द में डूबा देता है ,,,
मेरे प्रिय यह मात्र शब्द भर नहीं जिन्हें मैं सिर्फ रच देती हूँ बल्कि ये तो मेरे सच्चे दिल के सच्चे उद्गार है हाँ यही सच है और अगर सच हैं तो तुम्हारे दिल तक कभी न कभी जरूर पहुँच जाएँगे और हम अपने दर्द को बाँट लेंगे ,,,,और खुशी के पल ले आएंगे ,,,,,,हाँ हम मुस्कुराएंगे ,,,,
तुम्हें खुद में इस तरह से छुपा कर रखा है सनम
भूल गयी हूँ खुद को ही मैं तुम्हें याद रखने में !!
क्रमशः
सीमा असीम

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