हर घड़ी खुद से ही उलझती सुलझती रहती हूँ
मैं तो कश्ती भर हूँ तू ही है सागर, साहिल मेरा !!
सुनो प्रिय,
मैं दर्द जितना लिखती हूँ उससे भी कहीं ज्यादा अनलिखा रह जाता है न जाने यह दर्द कहाँ से उभर आता है ...... अपनी वफा के सहारे काट लेती हूँ मैं अपने दिन रात फिर नम आँख क्यों न मुस्कराये ,,,,हँस हँस के लूटा देंगे हम अपने प्यार की दौलत बिना गिला के, सपनों में सहारा बन के तुम बार बार आए.....सुनो प्रिय यह जो किस्मत ने तुम्हारा नाम मेरी हथेली पर उकेर दिया है उसे बार बार चूम के मुस्करा लेती हूँ और उस रब का शुक्रिया करके बार बार माथे से लगा लेती हूँ ....... मेरे प्रिय जब मैं अपने दर्द उड़ेलते अशकों को रोक नहीं पाती और धड़कनें बेसाख्ता धड़कती हैं तब मैं अपनी आँखें कस कर बंद कर लेती हूँ और दिल की अतल गहराईयों में उतर जाती हूँ....अपनी बेबसी, बेकली, बेचैनी सब तुमसे कहने लगती हूँ, सब कुछ कह कर जब हल्की होती हूँ, उस समय तुम मुस्कराते हुए कोई प्रेम गीत गुनगुना रहे होते हो .....प्रिय यह कैसी माया है तुम्हारी ? तुम दर्द में भी कैसे मुस्करा लेते हो , कैसे अशकों को आँखों में छिपाकर भी खिलखिला लेते हो ? बोलो प्रिय कैसे संभव हो जाता है यह सब तुम्हारे लिए.........तब तुम अपने उसी चिरपरिचित मुस्कान के साथ मुस्कराते हुए कहते हो सुनो मेरी प्रिय प्रियतमा, यही तो है हमारे प्रेम की गहराई और इश्क की ऊँचाई ......तुम्हें अपनी आँखों में सहेजे रहता हूँ और लबों पर मुस्कान की तरह बिखेरे रहता हूँ.... तुम भी तो यही कहती हो न फिर क्यों मुझे तुम अपनी आँखों से अशकों की तरह नीचे गिराती हो ... चलो प्रिया अब तुम भी वादा करो कि यूं ही मेरी तरह मुस्कराती रहोगी ......कभी कभी जब मुसकराना संभव न हो तो इसी तरह गहराई में उतर कर मुझसे बतिया लेना ....कर लेना अपने दिल के सारे बोझ हल्के ......हम साया बनकर साथ है हमेशा ..... हर राह में, हर डगर पर ....यह सफर बहुत आसान हो जाएगा गर मुस्कराते हुए चलोगे .....चाहें कोई मौसम हो या कोई रूत हो कोई फर्क ही नहीं पड़ेगा कि मैंने बड़े प्रेम से अपने दिल के गोशे में सहेज लिया है तुम्हें और तुम,हरे प्रेम को .....
देखो प्रिय मन कैसे फूलों सा खिल गया, महक उठा मन का कोना कोना ......प्रिय मैं तेरी धरा और तू मेरा आसमा है ....भले ही हम दूर हैं फिर भी दिल के करीब हैं .....भले ही हम मिल नहीं पाते हैं लेकिन हमेशा मिले हुए ही रहते हैं ....दुनियाँ की किसी भी फितरत से दूर अपने भोलेपन से घिरे प्रेम को दिल में पाले रहते हैं ....
कुदरत के लिखे हुए मेरे हाथों की रेखाओं को कोई कैसे धुंधला सकता है ...लो प्रिय मैंने समय की परिक्रमा करती धुरी से लिख दिया अपना जादुई प्रेम ....जीवन के हर पन्ने पर यूं ही लिखती रहूँगी प्रेम गीत और आसमान उसे यूं ही गुनगुनाता रहेगा सदियों तक .......बिना थमे, बिना रुके ...... खामोशियों भरे सन्नाटे में भी सारे शब्दकोश इसी तरह से रचते रहेंगे और सारी भाषाएँ उकरने को आतुर होती रहेंगी ........ क्योंकि हमने कण कण में ज़र्रे ज़र्रे में रच दिया है अपना प्रेम, विरह , दर्द , वफा और दुआ और इबादत भी .......आसान नहीं होता है प्रिय यह सब लेकिन सुनो मेरे प्रिय इतना मुश्किल भी तो नहीं ......
प्रेम में न हार होती है न जीत होती है न मिलन न ही जुदाई
न ही ये किस्मत की बात है
प्रिय अपना अंश अंश समर्पित करती रहूँगी यूं ही क्योंकि
यह तो सिर्फ समर्पण की बात है !!
मन न भए दश बीस प्रिय .........क्रमशः
सीमा असीम

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