गतांक से आगे 
तुम्हारी खुशी में ही है मेरी खुशी 
तुम सदा यूं ही मुस्कराते रहना !!
सुनो प्रिय
यह जो अश्क मेरी आँखों से अनवरत बहते हैं गालों को प्यार से थपथपाते हुए मेरे कंठ को चूम लेते हैं,,, यह बिना कुछ कहें, बिना कुछ बोले कितना अपनापन जगाते हैं . . . कितने पवित्र हैं यह अश्क जो किसी चाह के बिना भी निरंतर साथ निभाए जाते हैं . . . कहाँ माँगते हैं कुछ . . सुनो प्रिय यह न जाने कैसा विचित्र खेल है,, अजब, अनोखा ,आश्चर्य जनक कि मेरे मन को तुम ही बेचैनी से भर देते हो और तुम ही खोया चैन वापस लौटा लाते हो . मन का बाग मुरझाने से पहले ही हरा भरा कर देते हो ..मैं तो कभी कहती नहीं कुछ, फ़िर कैसे समझ जाते हो . . . कैसे मेरे दुखों को सुख में बदल देते हो . . अब मैं जोर से आवाज़ भी नहीं लगाती फ़िर कैसे तुम्हारे मन तक मेरे मन की बात पहुँच जाती है . . . प्रिय सुनो अब मैं अपने किसी भी भाव से तुम्हें विचलित या दुःखी नहीं करना चाहती, तभी तो मैं ढूँढ ढूँढ कर निकाल लेती हूँ उन अवसरों को जो मुझे ख़ुशी से लबरेज़ रखें . . उदासियों की परत उखाड़ फेंके और वहाँ पर सजा दे खूबसूरत और मन मोहक मुस्कान ताकि तुम्हारे मुख पर भी खिली रहे वही प्यारी मन मोहक मुस्कान . . जब कभी मैं कमल के फूल को निहारती हूँ तो उसके भीतर मुझे तुम दिखते हो अपनी चिरपरिचत मुस्कान के साथ मुस्कराते हुए . . बिल्कुल कमल के फूल की तरह ही तो है तुम्हारी निश्छ्ल मुस्कान . . बिना किसी आगाज और अंजाम की परवाह के बिना करते रहते हो हर किसी की मदद,,, बस वही दयालुता भरी पवित्रता दिख जाती है . . . तभी तुम्हारी मोहक मुस्कान को अपने चेहरे पर पड़ते हुए देख मैं शरमा आती हूँ . देखने लगती हूँ ज़मीन को,, तो तुम मेरी ठोढ़ी को बड़ी कोमलता से उठाकर कहते हो, सुनो प्रियतमा, हमारे प्रेम का साक्षी वो अनंत आकाश भी देखो कैसे तुम्हारे प्रेम पर निसार है और पल पल वो सब करता जाता है जो तुम्हारे मन के भाव होते है और उन्हें हमारे पास तक ले आता है,, तुम्हारे मन की हर बात,, वो कहते हैं न जब मन सच्चा हो तो ईश्वर स्वयं हमारी राह प्रशस्त करते चले जाते हैं . तब मैं शरमा कर कुछ और अपने मन के भीतर सिमट आती हूँ . . अजीब सा बंधन है न यह प्रिय कि इसमें जितना कस कर बंधते जाते हैं उतना ही मुक्त होते जाते हैं  और जितना मुक्त होते जाते हैं उतना ही और कस कर बंधते जाते हैं . . सुनो मेरे प्रिय, तुम मेरे इन अश्को पर कभी भी मत जाना, यह तो मेरा सच है जो मेरी आँखों से झड़ता रहता है . . . यह मेरी उदासियां भी तो मात्र दिखावा भर ही तो हैं . . . . क्योंकि मेरे भीतर भरा हैं ख़ुशियों का अकूत खजाना, जो निसार है तुम पर हाँ प्रिय मैं ख़ुश हूँ, बहुत खुश   . . . . 

हर पल में स्वागत है तुम्हारा 
हर खुशी वारी है तुम पर ! 
जब आओगे तब आओगे 
मेरा पल छिन निसार है तुम पर !! क्रमशः
सीमा असीम

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