गतांक से आगे
यूं ही दिन महीने साल गुजरते चले जाएँगे
हम प्यार में जीते और मरते चले जाएंगे !!
सुनो प्रिय,
मैं तुम्हारे लिए जाते हुए साल का आखिरी पत्र लिख रही हूँ , हर दिन एक पत्र तुम्हें लिखती रही हूँ ... न जाने तुम्हें कब यह मिलेंगे ? न जाने कब तुम इनका जवाब लिखोगे ? न जाने कब मुझे वो प्राप्त होंगे ? न जाने कब तक राह तकूँगी ? लेकिन मेरा इतना वादा है खुद से ही क्योंकि खुद से किया गया वादा कभी झूठा नहीं होता ...इंसान सबसे झूठ बोल सकता है .... सबसे अपनी बातें छुपा सकता है परंतु वो अपनी अंतरात्मा से कुछ नहीं छिपा सकता ...उससे झूठ नहीं बोल सकता ......तो खुद से ही वादा करती हुई कहती हूँ मैं आने वाले साल में भी तुम्हारे लिए यूं लिखती रहूँगी ....यूं ही तुम्हें जीती रहूँगी .....यूं ही तुम्हारे लिए मरती रहूँगी ......कोई फर्क नहीं पड़ेगा मेरे प्रेम में, न कम होगा न ज्यादा होगा, हाँ शायद ज्यादा हो सकता है ....... राह में आने वाले काँटों की परवाह किए बगैर चलती रहूँगी, देखे येकांटे किस तरह मेरी राह रोकेंगे ...मैं अपनी रफ्तार और तेज कर लूँगी .....वे कांटे भी फूल बनकर राह में बिखर जाएँगे ...उनकी चुभन कम हो जाएगी और राह खुशबू से महक जाएगी ......
मेरे प्रिय तुमको अपनी आँखों में यूं ही बसाये रहूँगी और दिल में समाये रहूँगी .....हमने तो बस तुम्हें ही अपना रब मान लिया है , जान लिया है , बाकी सब तुम पर छोड़ दिया है .....सारा भार तूम्हारे ऊपर डाल दिया है ......अब सब कुछ तुम जानो, तुम खुद समझो , तुम खुद देखो ,,,हम तो वही सब करेंगे जैसा तुम कहोगे ,,और हाँ सुनो प्रिय तुम्हारे बिना कहे भी हम समझ जाएँगे .....सब कुछ क्योंकि मैंने तो प्यार किया है अपना सब कुछ भुला कर ,,, सब कुछ मिटा कर सिर्फ तुम्हें ही पल पल में जीते हुए ,,,,तो कैसे मुझसे कुछ छिपा पाओगे ....बोलो प्रिय भला कैसे ? तुम्हें अपने सुख दुख का साथी और अपने जीवन का मांझी तुमको ही माना है, तुमसे ही सब कहती रहूँगी ,,,बताती रहूँगी .....मेरे दिल की नाव के मांझी, मेरे प्रिय, कभी किसी भी बात को तुमसे कहने में मुझे कभी कोई हिचकिचाहट न हो .... कभी कोई बात कहने में शर्म महसूस न हो ... कभी किसी बात के लिए अपनी नजरे तुमसे न चुरानी पड़े ....अपने दिल की वो हर बात जो मैं किसी से कह नहीं पाती उसे तुम्हें बताना है हाँ प्रिय सिर्फ तुम्हें
....तुम्हारा दिल जो चाहे करो .....चाहे मेरी नाव पार लगा दो या चाहें बीच मझधार में डूबा दो ...जैसी मर्जी ...जैसी इच्छा ...जैसी तुम्हारी मंशा .....क्योंकि हम तो सिर्फ तुम्हें ही अपना मान चुके है ....बांध लिया है खुद को तुमसे जन्मजनमान्तरों के लिए, रूह से रूह का रिश्ता बना लिया है ....न कोई और चाहत न और कोई तमन्ना ,,,,न ही कोई और हसरत .....सनम सिर्फ तुम्हारे सिवा ....तुम्हें पा लिया है सनम, जी गयी हूँ मैं .....मर जाऊँगी भी गर तो भी गिला नहीं ...
मेरे प्यारे प्रियतम, तुमने थाम कर मेरी कलाई जो अपना बना लिया है तो कभी नजर न चुराना, मेरे प्रिय कभी मुझसे अपनी नजरों का न छुपाना .......हमेशा अपनी नजर मेरी सच्ची नजरों से मिलाये रखना .......कह देना अपने मन की सब बातें बिना झिझके ,, बिना शरमाये प्रिय हम तो तुम्हारे हैं हमसे कैसा पर्दा ,,,,कैसी झिझक ,,,कैसी शरम ?
काँटों में खिले हैं फूल हमारे, रंग भरे अरमानों के
नादान हैं जो इन काँटों से, दामन को बचाये जाते हैं!!
क्रमशः
सीमा असीम

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