गतांक से आगे
सुनो प्रिय
           जब चोट लगती है तो तुम्हारी याद आती है ....तुम्हारा मुस्कराता चेहरा याद आता है फिर ये फिक्र हो जाती है कि कहीं तुम्हें कोई तकलीफ तो नहीं हुई .....मैं अपना दर्द भूल जाती हूँ और तुम्हारा दर्द महसूस करने लगती हूँ ...प्रिय यह चोट क्यों लगती है ?  प्रिय यह दर्द क्यों होता है ? प्रिय यह आँख क्यों रोती है ?
मैंने तो कभी किसी का कुछ गलत भी नहीं किया तो फिर सारी सजा मुझे ही क्यों मिल जाती है ? क्यों सारी तकलीफ मेरे नाम कर दी जाती है ? इस असहनीय पीड़ा को सहन करना जब मुश्किल हो जाता है तब मैं जीवन से दूर जाना चाहती हूँ अपनी अटकी अटकी साँसों को खत्म कर देना चाहती हूँ मैं नहीं जी पाती हूँ उस समय , बिलकुल भी नहीं .. हाँ प्रिय दर्द बहाती हुई आंखे बंद हो जाना चाहती हैं ....क्यों और कैसे बस यह दो शब्द परेशान करते हैं और मैं अपनी पूरी शक्ति लगाकर तुम्हें आवाज देती हूँ ...प्रिय मैं बहुत कमजोर हूँ हद से ज्यादा ...मैं दर्द को सहन नहीं कर पाती हूँ न ...उस वक्त तुम मेरी आवाज सुन लेते हो और बंधा देते हो संबल ....संभाल लेते हो मुझे अपनी मजबूत बाँहों में ...जगा देते हो मेरी कामनाएँ ॥ मैं भूल जाती हूँ दर्द ...
सुनो प्रिय, तुम्हारी कोमल प्रेम भरी छूअन मेरी देह को तब्दील कर देती है दिव्य देवालय में ...किसी जोगी के ताप का फल मिल जाता है या शायद मेरी तपस्या ही फलीभूत हो जाती है ...सब प्रेम मय हो जाता है .... भूल कर खुद को मैं मैं नहीं रहती तुम तुम नहीं रहते सब कुछ प्रेम हो जाता है ...दिल धड़कना भूल कर प्रेम धड़कने लगता है ...रगों में दौड़ता खून खून नहीं रहता प्रेम बन जाता है ॥प्रेम हमें कसकर बांध लेता है ...शाश्वत होता है प्रेम ...सच्चा और विश्वास से भरा .....ये जान दे कर भी जिंदा रहता है .....नहीं घबराता है मौत से भी ....मेरे प्रिय मेरे प्रेम का मान बनाए रखना...छिपाकर दुनियाँ की बेरहम नजरों से दिल की अनंत गहराइयों में छिपाए रखना ...बहुत पवित्र है मेरा प्रेम ये यूं ही बरकरार रहेगा ...यूं ही मेरे सीने में धड़कता रहेगा, रोम रोम से तुम्हारा नाम जपता रहेगा ,तुम्हारी हर खुशी पर निसार होता रहेगा , बिना कहे भी तुम्हारे मन की हर बात सुनता समझता रहेगा , कि बस यह प्रेम ही मेरा जीवन है , मेरी साँसे है, धड़कन है किसी चाह के बिना भी सच्चे दिल से तुम्हारे लिए दुआ मांगता रहेगा ,,,इबादत करता रहेगा ....देखो न प्रिय रात के इस तीसरे पहर में भी उस रब ने भी ,,,,अंधेरे में बिखेर दी आशा की किरण,, मेरे मन में छुपे हुए तुम जैसे मेरे सामने आकर खड़े हो जाते हो मुस्कराते हुए .... बस यही तो मेरी मंशा है कि सदा मुस्कराते रहें ... बिखरी रहे राहों में खुशियाँ ,,रोशनी और बिखर जाये फूल ही फूल किसी कांटे की कोई चुभन महसूस ही न हो ....मेरे प्रिय यह जो सच्चा प्रेम होता है न कभी नहीं घबराता बल्कि और भी मजबूत और गहरा होता जाता है इसका रंग रूप ...मेरी सच्चाई मेरे मन की निश्छलता ही मेरे चेहरे का नूर है ....
रहमत बरसा दे अपनी पनाहों में रखना सदा 
हर मुश्किल हो  आसां दिल से  दुआ है सदा 
बनाए रखना हौंसला यूं ही राहत मिलती रहे 
सच्चे दिल से गर मांगो सुनता है वो रब सदा !
क्रमशः 
सीमा असीम 

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