गतांक से आगे
कुछ कहा भी न जाये रहा भी न जाये !
दिल घबराए कि आ जा रे परदेसिया!!
सुनो प्रिय,
जब मैं सोचती हूँ कि कैसे बताऊँगी तुम्हें ? कैसे सुनाऊँगी तुम्हें ? अपने दर्द ,,अपनी तकलीफ.. अपनी परेशानी ,,,अपने गम,,, अपना विरह,,,,हाँ प्रिय मैं तो कुछ भी नहीं कह पाऊँगी ,,,मेरा भरा भरा दिल अटक अटक जाएगा और मिलते ही मैं अपनी सारी बाते भूल भी तो जाऊँगी ,,,खुशी से भर देगा तुम्हारा मिलना फिर कहाँ बचे रहेंगे कोई भी शिकवे, गिले....एक पल का मिलन ही दूर कर देगा मेरी सारी तकलीफ़ें ,,, कहाँ बता सकूँगी कि तुम्हारी याद में रो रो कर मेरी आँखों की रोशनी धूमिल हो गयी ,,,कहाँ बता पाऊँगी कि रात भर तारे गिन गिन कर काटी और सर्द रातों की सर्दी ने मुझे ठंड से जकड़ दिया ,,,क्या तुम्हें पता नहीं कि चाँद के जाते ही चाँदनी भी खत्म हो जाती है तो मैं कैसे रह पाई होऊँगी ,,,,,प्रिय यह प्रीत है कोई खेल नहीं है जो खेला और हारा और भूल गए ,,यह तो जान जाने के बाद भी साथ साथ चला जाता है अगले जन्म के लिए ,,, तुमसे ही हैं प्रिय जीवन के सारे सहारे, जिधर मैं देखूँ उधर हैं तुम्हारे नजारे !! हाँ यही सच है प्रिय तुम ही तुम हो क्योंकि मैं प्रेम करके डूबती ही चली गयी ....जरा सा भी उबरने की कोशिश करती हूँ तो दुनियाँ की रस्में देखकर घबरा जाती हूँ ...सही है मेरा डूबा रहना ,,,,और तुम्हारा प्रेम खोजता है न जाने कौन सी खुशी ? प्रिय कभी यूं मेरी तरह डूबकर देखना, अपने सब नफा नुकसान भूलकर इस प्रेम रस का पान करके देखना ,,,दे देना भले ही अपने सारे गम , दर्द ,, दुख और आँसू मुझे ,,,,तुम तो सिर्फ कुछ और संबर जाने की हद देखना ,,,
प्रिय सच्चा प्रेम तो सजाता है, सबारता है, निखारता है वो मिटाता नहीं है ,,,,जो मिटा दे या मिटाने की कोशिश करे वहाँ प्रेम था ही नहीं सिर्फ स्वार्थ था ,,,प्रेम तो रोये रोये से होता है ,,नस नस से होता है ,,पूरा शरीर ही प्रेम में डूबा होता है ,,,कहीं से भी बच निकलने की जगह ही नहीं, अगर बचना चाहा तो प्रेम नहीं था बिलकुल भी नहीं था क्योंकि प्रेम में न मांग होती है न स्वार्थ होता है ,,,मेरे प्रिय कभी तुम मेरी तरह से ही मुझे प्रेम करके देखना सिर्फ एक बार ही ,,,,
मैं पुकार रही हूँ आज तुम्हें न जाने क्यो, दिल पूरी रात तुम्हें आवाज लगाता रहा, आती जाती सांस तुम्हारा नाम लेती रही और पूरी रात यूं ही आँखों में गुजर गयी ,,,प्रिय मैंने तो खुद को मिटा दिया है खत्म कर दिया अपने तन को प्रेम अग्नि में जलाकर भस्म कर लिया है ...मेरा तो मुझ में कुछ बचा ही नहीं ...अब आ जाओ ,,कितने ही माह आए और चले गए ,,,अब मुझे तुम ही बताओ ,,,इतने दुख सह सह कर कोई कैसे बचेगा ,,,,,
कहाँ जीवित रहेगा ...तुमसे लगन लगाए ,मिलन की आस जगाए बिता रही हूँ अपने पल छिन ,,,,आ जाओ प्रिय ,,अब आ जाओ ,,,
क्रमशः
सीमा असीम

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