गतांक से आगे
बड़े अच्छे लगते हैं
ये धरती ये नदिया ये रैना और ?????
और तुम ,,,,,,,,
सुनो प्रिय,
यह सच है कि मुझे आजकल बहुत अच्छा लगता है मैं खुलकर मुस्करा देती हूँ मन में कोई उलझन भी नहीं है लेकिन जब कभी मैं बहुत गहराई में डूबकर तुम्हें सोचती हूँ तो न जाने क्यों मेरी आँखों में सिर्फ आँसू होते हैं और मैं इस जिंदगी से घबरा जाती हूँ बेचैनी से भर जाती हूँ ,,,क्यों होता है ऐसा नहीं पता पर हमेशा ऐसा ही होता है ...न जाने कैसा रिश्ता सा बन गया है इन आंसुओं से कि यह हर पल में हर क्षण में मेरा साथ निभाए जा रहे हैं ,,,कभी कभी ऐसा महसूस होने लगता है कि अगर अपने इन आंसुओं और तुम्हारा कंपटीशन किया जाये तो जीत आंसुओं की हो जाएगी और तुम हार जाओगे ....तब मुझे तुम्हारा हारना अच्छा नहीं लगेगा बिलकुल भी नहीं ...तुम्हारी किसी भी तरह की हार हो लेकिन होगी तो हार ही न .....क्योंकि मैंने तो तुम्हें हमेशा जीतते हुए ही देखा है और तुम्हारा जीतना ही मुझे खुशी देता है ...तभी तो मैं बार बार हारकर भी तुम्हें जिता देती हूँ ...शायद तुम्हें कभी इस बात का अहसास ही नहीं होता और मैं चाहती भी तो नहीं कि तुम्हें नाममात्र का भी एहसास हो ,,,,सुनो मेरे प्रिय यह जो जीवन होता है न ,, बस कुछ पलों का ही होता है ,,,क्षण भंगुर होता है तो फिर क्यों इतनी लालसायेँ ? क्यों मन का भटकाव ? क्यों नहीं संतुष्टि ? आखिर हम क्या पा लेना चाहते हैं समझ ही नहीं आता ,,,,प्रिय मेरा तो एक ही मन ,,,एक ही जीवन ,,,,और एक सिर्फ तुम ,,,,हाँ प्रिय तुम और सिर्फ तुम ....मेरे मन ने बस तुम्हें ही अपना मान लिया है ,,,अब तुम्हें ही अपना सबकुछ सौंप दिया है ...तुम मुझे बार बार कहते हो मैं तो तेरा ही हूँ लेकिन प्रिय मुझे लगता है कि हमें एक दूसरे को कभी कहने की जरूरत ही न पड़े, बिना कहे ही सब समझ जाये,सारे अहसास ,,,सारी भावनाएं , सारे विचार ,, क्योंकि रिश्ता निभाने के लिए ही होता है, बस उसे सच्चे दिल और ईमानदारी से निभा लिया जाये तो फिर कोई उलझन ही न हो ....मेरे प्यारे प्रियतम मेरा जीवन और जीवन जीने की चाहत तो तुमने ही पैदा की है ....तुम हो तो जीवन है ...तुम्ही तो मुझे गहरे भंवर से खींचकर बाहर निकाल लेते हो, उबार लेते हो हाथ पकड़ कर .....तुम्हें देखती हूँ तो ऐसा लगता है मानों हर तरफ बहार का मौसम आ गया है ...मैं हंस पड़ती हूँ ...अंधेरे में भी रोशनी बिखर जाती है .....आस की जोत जल जाती है ...॥मेरे प्रिय तुम साथ हो फिर ये लुका छिपी का कैसा खेल ...यह प्रेम की कैसी बिडंबना है .....इतने करीब होकर भी दूर लगते हो और इतने दूर होकर भी एकदम करीब महसूस होते हो कि मैं सुनने लगती हूँ तुम्हारी साँसों का चलना ...धड़कनों का धड़कना ...रख देती हूँ अपना सर तुम्हारे वक्ष पर, तुम मेरे बालों को सहलाते हुए, संभालते हुए ,,प्यार से मेरा माथा चूम लेते हो , यह कहते हुए कि तुम्हारा हर गम मेरा है और मेरी हर खुशी पर तुम्हारा हक है ...जमाने की हर परवाह से बेपरवाह होकर मैं साथ हूँ यूं ही सदा ॥ यह गला कैसे भर आया, यह आँसू कैसे छलक पड़े ......अरे यह तो खुशी के आँसू हैं प्रिय ...
यह आज का रिश्ता नहीं सदियों का नाता है
यह आँसू भी तो मेरी खुशी का ही तकाजा हैं !!
क्रमशः
सीमा असीम

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