गतांक से आगे
कितने काँटे चुभ गए पाँव में कि चलना मुश्किल होने लगा
क्या गलती की हमने जो फूलों भरी सच्ची राह जो चुन ली!!
सुनो प्रिय,
              मैं उछल पड़ी थी खुशी से और दिल मचल सा गया था किसी मासूम बच्चे की तरह तुम्हें यूं सामने देखकर मैंने शरमा कर अपनी आँखें बंद कर ली, कैसे कहूँ ? क्या कहूँ ? लब सी गए मेरी पलकें झुकी की झुकी रह गयी, मैं मुस्कराना चाहती थी लेकिन दिल की धड़कनों ने एकदम असहज कर दिया ...प्रिय, प्रिय मेरे प्रिय मेरी धड़कनें पुकार रही थी और मैं कुछ कह ही नहीं पा रही.....मानों जुबान बंद हो गयी है कितनी मुश्किल से खुद को संयत किया था प्रिय मैं सारा प्रेम तुम पर लूटा देने को आतुर हो उठी थी .....मेरा सबकुछ तुम्हारा ही है प्रिय मेरा मुझे में कुछ भी नहीं ,कुछ भी नहीं सब तेरा ...हाँ सिर्फ तेरा ...मैं अपनी दोनों अंजुरियों में भरकर अपने दिल का सच्चा प्रेम तुम्हें समर्पित करती हूँ ....मेरा वादा है हाँ मेरे दिल का सच्चा वादा कि चाहें कोई रूत आए कोई मौसम मैं हर तरह से तुम्हें समर्पित रहूँगी, हर हाल में सिर्फ तुम्हारी खुशी के लिए खुद को मिटाती रहूँगी ...खत्म कर दूँगी खुद को ....... अपना पलछिन तुम्हारे नाम करती रहूँगी ...बिना किसी चाह के और बिना किसी स्वार्थ के .......मैं जानती हूँ प्रिय यह बहुत मुश्किल है ...बहुत कठिन है लेकिन प्रेम में कुछ भी असंभव नहीं होता बल्कि यह दिन प्रतिदिन मजबूत होता चला जाता है बिना किसी रुकावट के आगे ही आगे बढ़ता चला जाता है..... बिना कुछ बोले भी कितना कुछ कहता सुनता चला जाता है ॥निशब्द कर देता है प्रेम .....प्रेम में कुछ भी कहने सुनने की जरूरत भी कहाँ होती है ......यह मौन है, शून्य है ......हर पल तुमसे बातें करके भी और भरा भर होकर भी ........मुझे पता है प्रिय कि मैंने तुम्हें प्रेम किया है और अपनी सारी खुशियाँ , उम्मीदें , कामनाएँ ,ख्वाहिशें , सब तुम्हारे नाम कर दी हैं ....प्रेम में कुछ अपना कहाँ होता है ,, कहाँ कुछ भी अपना रहता है प्रिय ....... सब तुम्हारी मर्जी ...सब तुम्हारी ही मर्जी पर है जो चाहें, जैसे चाहें करो, मैंने तो तुम्हें ही सब समर्पित कर दिया ......तुम्हारी बातें ...तुम्हारी करनी सब तुम जानों मैंने तो तुम्हें अपने जिस्म पर खाल की तरह से लपेट लिया है और मैं स्वयं उसके भीतर सिमट गयी हूँ ........रूह से रूह का नाता बना लिया है और अपनी आँखों में अशकों की तरह बसा लिया है अब चाहें तुम कुछ करो, तुम जानो ... प्रिय खुशी दो या गम कोई परवाह नहीं .....हाँ कोई भी परवाह नहीं ...
मेरे प्यारे प्रियतम मुझे एक बात तो बताओ, तुम कैसे मेरे मन के झंकृत तारो की सरगम सुन लेते हो .....कैसे मेरी आँखों में  बसे उपवन को देख लेते हो .... कैसे मेरे अधरों की प्यास, तड़पन को बिना कहे ही पहचान लेते हो .....कितना प्रेम भरा है मेरे मन में, मेरे दिल में सब समझ लेते हो ....कैसे आकर अचानक से मेरा रोम रोम पुलकित कर देते हो .......कैसे हर लेते हो मेरा सारा दर्द और आँखों में प्रेमाश्रु भर देते हो ....रुकी रुकी सी धड़कनों को चला देते हो और चल देते हो साथ साथ मेरा हाथ अपने हाथ में लेकर उस कठिन और दुश्वार राह पर ....जो सच की राह है, जो प्रेम की राह है .....देखो प्रिय वो कठोर पहाड़ जो दिन रात अपनी तपस्या में रत हैं वे भी हमारे प्रेम को देख ध्यान तोड़कर अपने आशीषों से हमें नवाजने लगे हैं .....अपना वरद हस्त हमारे सर रखे हुए हैं ......अपनी कठोरता को छोड़ मेरे प्रेम में बिव्हल हो उठे हैं ......मेरी तपस्या को फलीभूत करने के लिए हर शय से दुआ करने लगे हैं ........ मेरे प्रिय मैंने तो सिर्फ प्रेम किया और तुम्हारी खुशी के लिए खुद को न्योछावर किया बस इतना सा तप किया और तो मेरी कोई मंशा ही नहीं, हाँ प्रिय मेरा सिर्फ यही सच है मेरी और कोई मंशा नहीं ......
मेरा मुझ में कुछ नहीं जो कुछ है सो तोर 
तेरा तुझ को सौंपती क्या लागत है मोर !!
क्रमशः 
सीमा असीम



      


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