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Showing posts from December, 2017
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गतांक से आगे  सजना है मुझे सजना के लिए हर अंग का रंग निखार लूँ  अपनी उलझी लटें संबार लूँ कि सजना है मुझे सजना के लिए !!  सुनो प्रिय,                 आज जी चाहता है कि खुद को ही प्रेम कर लूँ ,,,खुद को आइने में निहारते हुए यही ख्याल मन में आया था क्योंकि आईने को देखते समय मैं खुद को नहीं तुम्हें देखने लगती हूँ और मेरा प्रेम तुम्हें देखकर मुस्करा पड़ता है ...मैं तुम्हें अपनी पलकों में बंद करके तुम्हारी बालाएँ लेने लगती हूँ कि कहीं नजर न लग जाये ...मेरे प्रिय आज नव वर्ष के पहले दिन सूर्योदय होते ही ढेरों खुशियों की किरने बिखर जाएँ ......आँखों में भरे सतरंगी सपनों में रंग भरते हुए उनमें खुशियों के पंख लग जाएँ .... भोर की पहली लाली मन की पवित्रता को और कुछ ज्यादा पवन कर दे मिटा दे मन के सारे मैल और ले आए मेरे प्रिय का प्रेम संदेश जो पल पल दिल कहता रहता है दिल से ......सुनो मेरे प्रिय कुछ कहने की जरूरत ही कहाँ होती है जब दिल, हर पल में दिल से बातें करता रहता है कितना कुछ कहता है कभी मुस्कराता ,,कभ...
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गतांक से आगे यूं ही दिन महीने साल गुजरते चले जाएँगे हम प्यार में जीते और मरते चले जाएंगे !! सुनो प्रिय,                 मैं तुम्हारे लिए जाते हुए साल का आखिरी पत्र लिख रही हूँ , हर दिन एक पत्र तुम्हें लिखती रही हूँ ... न जाने तुम्हें कब यह मिलेंगे ? न जाने कब तुम इनका जवाब लिखोगे ? न जाने कब मुझे वो प्राप्त होंगे ? न जाने कब तक राह तकूँगी ? लेकिन मेरा इतना वादा है खुद से ही क्योंकि खुद से किया गया वादा कभी झूठा नहीं होता ...इंसान सबसे झूठ बोल सकता है .... सबसे अपनी बातें छुपा सकता है परंतु वो अपनी अंतरात्मा से कुछ नहीं छिपा सकता ...उससे झूठ नहीं बोल सकता ......तो खुद से ही वादा करती हुई कहती हूँ मैं आने वाले साल में भी तुम्हारे लिए यूं लिखती रहूँगी ....यूं ही तुम्हें जीती रहूँगी .....यूं ही तुम्हारे लिए मरती रहूँगी ......कोई फर्क नहीं पड़ेगा मेरे प्रेम में, न कम होगा न ज्यादा होगा,  हाँ शायद ज्यादा हो सकता है ....... राह में आने वाले काँटों की परवाह किए बगैर चलती रहूँगी, देखे  येकांटे किस तरह ...
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रूह सृष्टि में चाँद जब मुस्कराएगा सूरज आसमां के पीछे दुबक जायेगा घनघोर घटाए भी भूलेंगी बरसना उस पल कुछ पल को धरती भी थमेगी, ठिठक जाएगी, भूल जाएगी घूमना तब कल्पनाओं में मैं तुम्हें अपने करीब पाऊँगी तुम्हारे मौन में भी तुमको सुनती रहूँगी और वे जानी पहचानी सी धड्कने संग संग धडकने लगेंगी समा जायेगी उस वक्त मेरी रूह में तुम्हारी रूह तब महक उठेगा हमारा पारदर्शी सच्चा प्रेम चन्दन सा सुनो प्रिय, रुई के नर्म फाये सा झरता हुआ बर्फ एकटक निहारती हुई मेरी आँखें बना देगी तुम्हारा अक्स मुस्कुराता हुआ टकटकी लगाये मेरी ओर प्रेम से निहारता हुआ यह प्रेम ही है जो धड़कता है धड़कनों में  उस प्रिय का नाम उच्चारित करता हुआ आसमा और धरा का नाम !! सीमा असीम
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गतांक से आगे आपके ख्यालों से पल भर निकलती नहीं  खुद में हूँ ही नहीं, आप में हूँ मैं कहीं ! हर लम्हा आपकी बाते याद करती हूँ मैं  महफूज इस तरह खुद को रखती हूँ मैं !! सुनो प्रिय,              आपका मेरे जीवन में होने भर से ही ज़िंदगी फूलों सी महकती है और मन खिला रहता है ...यह सुख, दुख, दर्द, आशा, निराशा, मिलना, बिछुड्ना, खोना, पाना तो मात्र क्षण भर को ही आते हैं लेकिन मन तो हमेशा, हर हाल में तुम में ही लगा रहता है और मैं हवाओं से छन छन के आती हुई इस सुगंधित खुशबू से सराबोर होती रहती हूँ .....मुझे मिटाकर सिर्फ प्रेम बचा रहता है, मैं उस वक्त कभी शरमाती हूँ, कभी मुसकाती हूँ, कभी गुनगुनाती हूँ, तो कभी मेरे पाँव थिरक उठते हैं..... पूरी दुनियाँ रंगों से भरी नजर आती है, प्रेम रंग में रंगी मैं तुम्हारी खुशियों के लिए हर कोशिश करती हूँ ताकि प्रेम सर्वत्र व्याप्त रहे ....पता है प्रिय प्रेम का कोई भी रंग नहीं होता ....कोई भाषा नहीं  ...कोई लय नहीं ...कोई राग नहीं ...कोई गीत नहीं ...कोई गान नहीं ....फिर भी प्रिय आपके ह...
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गतांक से आगे  हर  घड़ी खुद से ही उलझती सुलझती रहती हूँ  मैं तो कश्ती भर हूँ तू ही है सागर, साहिल मेरा !! सुनो प्रिय,             मैं दर्द जितना लिखती हूँ उससे भी कहीं ज्यादा अनलिखा रह जाता है न जाने यह दर्द कहाँ से उभर आता है ...... अपनी वफा के सहारे काट लेती हूँ मैं अपने दिन रात फिर नम आँख क्यों न मुस्कराये ,,,,हँस हँस के लूटा देंगे  हम अपने प्यार की दौलत बिना गिला के,  सपनों में सहारा बन के तुम बार बार आए.....सुनो प्रिय  यह जो किस्मत ने तुम्हारा नाम मेरी हथेली पर उकेर दिया है उसे बार बार चूम के मुस्करा लेती हूँ और उस रब का शुक्रिया करके बार बार माथे से लगा लेती हूँ ....... मेरे प्रिय जब मैं अपने दर्द उड़ेलते अशकों को रोक नहीं पाती और धड़कनें बेसाख्ता धड़कती हैं तब मैं अपनी आँखें कस कर बंद कर लेती हूँ और दिल की अतल गहराईयों में उतर जाती हूँ....अपनी बेबसी, बेकली, बेचैनी सब तुमसे कहने लगती हूँ, सब कुछ कह कर जब हल्की होती हूँ, उस समय तुम मुस्कराते हुए कोई प्रेम गीत गुनगुना रहे होते हो .....प्रिय...
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गतांक से आगे  न नींद आए न करार दिल को आए  चुपके से आकर वे प्रेम गीत सुनाये ! सुनो प्रिय                आज चाँद के संग संग तुम चले आए मैं निहारती रही उस चाँद को देर तलक अपनी भाव बिव्हल आँखों को खोलते और बंद करते हुए .....कितनी ही बातें मन ही मन में उससे कर डाली प्रिय यह चाँद तुम्हारी छवि में तब्दील हो जाता है और आकर बैठ जाता है मेरी खिड़की के मुहाने पर .....मैं शरमा जाती हूँ और वो मंद मंद मुस्कराता रहता है ..उस समय सारा संसार चैन की नींद सोया रहता है और हम दोनों एक दूसरे का साथ निभाते हुए जागते रहते हैं ..दिल का दर्द कम होने लगता है .सुनो प्रिय जब तुम मुस्कराते हो दिल सुकु से भर जाता है , तब न जाने दिल की बेचैनी कहाँ चली जाती है ,,न जाने कहाँ से करार आ जाता है और मैं हल्की हल्की सी होकर हवा से बातें करने लगती हूँ पाँव जमीं पर टिकते ही नहीं..गीत लबों पर थिरक उठते हैं ....लेकिन सूर्य निकलते ही कैसे  तन्हा तन्हा कर जाता है ......  प्रिय मुझे आज तुम बहुत याद आए बहुत ही ज्यादा, मैं तुम्हारी ह...
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गतांक से आगे जो कह देते हो बस वही मान लेती हूँ  रब से खुशियों की दुआ मान लेती हूँ  धड़कनों संग धड़कने वाले मेरे प्रिय  चाँद तारों में भी तुम्हें निहार लेती हूँ !! सुनो प्रिय,               आज अचानक से आसमां की तरफ नजर उठ गयी थी उस जाम में फंसे हुए ...अरे यह क्या तुम कैसे चाँद के बीच में नजर आ गए उस पतले से अर्धचंद्राकार चाँद में खड़े खड़े मुस्करा रहे थे मैं तो तुम्हें नजर भर के देखना चाहती लेकिन कहीं मेरी नजर न तुम्हें लग जाये यह सोचकर मैंने अपनी आँखें बंद कर ली .....और तब तुम मेरे मन में उतर आए मैं तुम्हें फिर कनखियों से झाँकने लगी ........मेरे प्रिय, मेरे प्यारे प्रियतम अब तो हर खुशी तुमसे ही है, जिंदगी भी तुम, बंदगी भी तुम, जान भी तुम और जहां भी तुम .......प्रिय मैं सोचती हूँ कि अब जब मिलन के दिन करीब आ रहे हैं, तब हम तुम्हें कैसे बता पाएंगे कि हमने कैसे दिन गुजारे ? हम कैसे पलछिन तुम्हें नाम लेकर मन ही मन मनका की तरह फेरते रहे ? हम तुम्हें याद कर कर के इतना रोये कि मेरी आँखों में सिंदूरी लालिमा से ...
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गतांक से आगे कितने काँटे चुभ गए पाँव में कि चलना मुश्किल होने लगा क्या गलती की हमने जो फूलों भरी सच्ची राह जो चुन ली!! सुनो प्रिय,               मैं उछल पड़ी थी खुशी से और दिल मचल सा गया था किसी मासूम बच्चे की तरह तुम्हें यूं सामने देखकर मैंने शरमा कर अपनी आँखें बंद कर ली, कैसे कहूँ ? क्या कहूँ ? लब सी गए मेरी पलकें झुकी की झुकी रह गयी, मैं मुस्कराना चाहती थी लेकिन दिल की धड़कनों ने एकदम असहज कर दिया ...प्रिय, प्रिय मेरे प्रिय मेरी धड़कनें पुकार रही थी और मैं कुछ कह ही नहीं पा रही.....मानों जुबान बंद हो गयी है कितनी मुश्किल से खुद को संयत किया था प्रिय मैं सारा प्रेम तुम पर लूटा देने को आतुर हो उठी थी .....मेरा सबकुछ तुम्हारा ही है प्रिय मेरा मुझे में कुछ भी नहीं ,कुछ भी नहीं सब तेरा ...हाँ सिर्फ तेरा ...मैं अपनी दोनों अंजुरियों में भरकर अपने दिल का सच्चा प्रेम तुम्हें समर्पित करती हूँ ....मेरा वादा है हाँ मेरे दिल का सच्चा वादा कि चाहें कोई रूत आए कोई मौसम मैं हर तरह से तुम्हें समर्पित रहूँगी, हर हाल में सिर्फ तुम्हार...
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गतांक से आगे सुनो प्रिय            जब चोट लगती है तो तुम्हारी याद आती है ....तुम्हारा मुस्कराता चेहरा याद आता है फिर ये फिक्र हो जाती है कि कहीं तुम्हें कोई तकलीफ तो नहीं हुई .....मैं अपना दर्द भूल जाती हूँ और तुम्हारा दर्द महसूस करने लगती हूँ ...प्रिय यह चोट क्यों लगती है ?  प्रिय यह दर्द क्यों होता है ? प्रिय यह आँख क्यों रोती है ? मैंने तो कभी किसी का कुछ गलत भी नहीं किया तो फिर सारी सजा मुझे ही क्यों मिल जाती है ? क्यों सारी तकलीफ मेरे नाम कर दी जाती है ? इस असहनीय पीड़ा को सहन करना जब मुश्किल हो जाता है तब मैं जीवन से दूर जाना चाहती हूँ अपनी अटकी अटकी साँसों को खत्म कर देना चाहती हूँ मैं नहीं जी पाती हूँ उस समय , बिलकुल भी नहीं .. हाँ प्रिय दर्द बहाती हुई आंखे बंद हो जाना चाहती हैं ....क्यों और कैसे बस यह दो शब्द परेशान करते हैं और मैं अपनी पूरी शक्ति लगाकर तुम्हें आवाज देती हूँ ...प्रिय मैं बहुत कमजोर हूँ हद से ज्यादा ...मैं दर्द को सहन नहीं कर पाती हूँ न ...उस वक्त तुम मेरी आवाज सुन लेते हो और बंधा देते हो संबल ....संभा...
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गतांक से आगे  बेसबब बेचैनी से दिल भरा भरा सा रहा पूरे दिन  पीर ऐसी उठी कि आँख छलकी छलकी सी रही !! सुनो प्रिय,               जो मैं तुम्हें लिखती हूँ सर्द रातों के अंधेरे में अपना चमक बिखेरता हुआ प्रेम, कभी कभी ये मुझे गम के आगोश में भर देता है और मैं बेचैन होकर घबराई हुई सी फिरती हूँ, घर बाहर कहीं भी सकूँ नहीं आता है ,,,कहीं भी मन को तसल्ली नहीं मिलती है ...खुद को भूलकर, साँसे लेना छोड़कर मैं जीने लगती हूँ तुम्हें, लेने लगती हूँ साँसे तुम्हारे नाम की, यूं तो खुशी में भी ऐसा होता है तब प्रेम छलका छलका सा रहता है हर तरफ खुशी का अहसास कराता हुआ बिखरा बिखरा सा ...गाता हुआ और झूमता हुआ सा लेकिन उदासी में ऐसा क्यों होता है ? क्यों होता है ऐसा मेरे प्रिय,  उस वक्त मैं तोड़ देना चाहती हूँ सारी रस्में और आसमा के पार जाकर तुम्हारे आगोश में सिमट जाने को उतावली हो उठती हूँ ,,,,,,अपना मुंह तुम्हारे वक्ष में छिपा कर जी भर के अपना मन हल्का करना चाहती हूँ ....क्या तुम जानते हो प्रिय यह दिल की आवाज है और सच्चाई से नि...
प्रिय मेरे गीले नयन बनेंगे आरती! श्वासों में सपने कर गुम्फित, बन्दनवार वेदना- चर्चित, भर दुख से जीवन का घट नित, मूक क्षणों में मधुर भरुंगी भारती! दृग मेरे यह दीपक झिलमिल, भर आँसू का स्नेह रहा ढुल, सुधि तेरी अविराम रही जल, पद-ध्वनि पर आलोक रहूँगी वारती! यह लो प्रिय ! निधियोंमय जीवन, जग की अक्षय स्मृतियों का धन, सुख-सोना करुणा-हीरक-कण, तुमसे जीता, आज तुम्हीं को हारती!
विरह की घडियाँ हुई अलि मधुर मधु की यामिनी सी! दूर के नक्षत्र लगते पुतलियों से पास प्रियतर, शून्य नभ की मूकता में गूँजता आह्वान का स्वर, आज है नि:सीमता लघु प्राण की अनुगामिनी सी! एक स्पन्दन कह रहा है अकथ युग युग की कहानी; हो गया स्मित से मधुर इन लोचनों का क्षार पानी; मूक प्रतिनिश्वास है नव स्वप्न की अनुरागिनी सी! सजनि! अन्तर्हित हुआ है ‘आज में धुँधला विफल ‘कल’ हो गया है मिलन एकाकार मेरे विरह में मिल; राह मेरी देखतीं स्मृति अब निराश पुजारिनी सी! फैलते हैं सान्ध्य नभ में भाव ही मेरे रँगीले; तिमिर की दीपावली हैं रोम मेरे पुलक-गीले; बन्दिनी बनकर हुई मैं बन्धनों की स्वामिनी सी!
दिल दीवाना बिन सजना के माने ना ये पगला है समझाने से समझे ना धक धक बोले इत उत डोले बिन रैना ये पगला है समझा ने से समझे ना दर्द-ए-जुदाई क्या होता है तुम जानो मैं जानूं दर्द-ए-जुदाई क्या होता है तुम जानो मैं जानूं प्यार बुलाये दुनिया रोके किसका कहना मानूं तुमसे मिले बिन दिल को कुछ भी सुझे ना ये पगला है समझा ने से समझे ना - बन के लहू नस नस में मुहब्बत दौड़े और पुकारे बन के लहू नस नस में मुहब्बत दौड़े और पुकारे प्यार में सब कुछ हार दिया पर हिम्मत कैसे हारे कह दो दुनिया दिल का रस्ता रोके ना ये पगला है समझा ने से समझे ना दिल दीवाना बिन सजना के माने ना ये पगला है समझाने से समझे ना
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गतांक से आगे पल तो गुजरते नहीं और दिन गुजरते चले जाते हैं ! आपकी याद और आप यूं साथ निभाते चले जाते हैं !! सुनो प्रिय,              जब मुझे कोई दुख या दर्द परेशान करता है तब मैं न चाहते हुए भी तुम्हें आवाज लगा देती हूँ अनजाने में ही ,,मैं उस वक्त चाहती हूँ प्रिय तुम्हारे कंधे पर अपना सर रखकर सब कुछ कह देना और खुद को हल्का कर देना लेकिन मैं खामोशियों को ओढ़ लेती हूँ और बहा देती हूँ अपनी आँखों से सारा दर्द क्योंकि तुमसे कहकर तुम्हारे दर्द को बढ़ा देना शायद मुझे अच्छा नहीं लगता है इसीलिए सह लेती हूँ वे सारे गम, दर्द, दुख अकेले ही जो मुझे तुमसे बांटने होते हैं ...पता है प्रिय तुम्हारे कंधे पर  टिका हुआ मेरा सर मुझे अहसास देता है तुम्हारे होने का जैसे मेरी प्रेम भरी पुकार को सच्चे विश्वास का आश्रय मिल गया हो ...मेरा विश्वास तो तुम ही हो प्रिय सिर्फ तुम्हारा विश्वास ही है जो तुम्हारी हर बात मानने को मजबूर हो जाती हूँ और यह कहने को भी जैसी तुम्हारी मर्जी या जैसा तुम कहोगे सब मान लूँगी क्योंकि तुमसे बढ़कर कुछ भी नहीं है न मेरे लिए  .... जैसे ध...
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गतांक से आगे  कुछ गीत लबों पर आते हैं कुछ साज से बजने लगते हैं  कुछ मन सकुचा आता है जब तुम आ जाते हो यूं सामने !! सुनो प्रिय,         न जाने कैसा ये रिश्ता है न जाने वो कौन सा नाता है जो तुम्हें देखने भर से ही दिल को सकूँ सा जाता है और दिल की घबराहट न जाने कहाँ चली जाती है और मन खुशी से प्रफुल्लित हो जाता है सारे गम कहीं दुबक जाते हैं ....मेरे सच्चे साथी, मेरे प्रियतम कैसे सुन लेते हो मेरी अनकही बातें भी तुम और फिर चुपचाप आ जाते हो बिना कुछ कहे भी कितना कुछ कह जाते हो, समझा जाते हो मेरे मन को ॥अधीर मन को धीर बंधा जाते हो ... भावनाओं के उतार चढ़ाव के संग लहरों सा बहने लगते हो मैं मुस्करा देती हूँ और तुम बस यूं ही एकटक देखते रह जाते हो ,,,,प्रिय अभी तो मैं जागी थी ख्वाबों में तुम्हारा साथ निभाते हुए ....तुमने मेरे हाथ को अपने हाथ में ले रखा था और मुस्करा रहे थे यह कहते हुए कि आज न जागो मेरा साथ निभाती रहो, बैठी रहो, मेरी नजरों के सामने लेकिन मैंने बात नहीं मानी और अपनी आँखें खोल दी तो तुम साकार रूप में मेरे सामने आकर बैठ गए ..... कितने अकेल...
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गतांक से आगे वफा का दीप जलाकर बसाया तुम्हें निगाहों में  कैसी है यह भटकन जिंदगी की उदास राहों में  !! सुनो प्रिय             अपना बालम, अपना साजन, अपना रांझा,अपना मंजनू सब कुछ तुम को ही बना लिया है और तुम्हारी खुशी के लिए ही अब सब कुछ करना है, बस इतनी सी ही तो मंशा है न मेरी और कुछ भी नहीं, हाँ प्रिय और कोई चाहत नहीं ,,,,,,जब आसमां कोहरे से घिरा होता है और सूर्य अपनी किरणों को समेटे रज़ाई में ठिठुर रहा होता है तब मैं रब से तुम्हारी खुशी की दुआ मांग लेती हूँ ,,,,,प्रिय तुम सही हो न ? कैसे बीते इतने दिन ? कैसे गुजरी रातें ? कहीं कोई तकलीफ तो नहीं ? कहीं मेरी याद तो नहीं आई ?  पता है प्रिय यहाँ तो  बहुत सारी खुशियाँ हैं ,,,,,बहुत सारा प्रेम है ..... और सूर्य भी समय से आ जाता है अपनी रोशनी बिखेरने को ,,कोहरे का नामोंनिशान ही नहीं रहता ....कहीं कोई अंधेरा नहीं बस प्रकाश भरी रोशनी है ....वक्त और किस्मत की कोई बात ही नहीं ...क्योंकि यह संसार तो नश्वर है और तुम्हारा होना भर ही एक सच है तभी तो इस अंधेरी क...
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गतांक से आगे आज तुम खुद चले आए थे सपने में पूछने क्यों हो उदास  हूँ मैं कहीं भी दूर या पास रहता हूँ मैं हरदम तेरे आसपास !! सुनो प्रिय,       जब तुम्हारे इंतजार में मेरी आँखें थक गयी तो मैं लिखने लगी एक प्रेम कविता ,,कुछ फूल ,कुछ पत्तियों और चाँद, तारे, आसमां, जमीं पर लिखा लेकिन प्रिय मेरा मन इन चीजों में बिलकुल भी नहीं लगा क्योंकि मेरा मन तो अटका रहता है तुम में ही ,,पता नहीं क्या खाया होगा ? पता नहीं कैसे समय बिताया होगा ? पता नहीं सुख की नींद आई भी होगी या नहीं ? इस सर्द मौसम में कहीं सर्दी न लग जाये ,,,ऐसे ही तमाम बातें मुझे परेशान करती रही ,,,मेरे प्रिय क्यों चले जाते हो ? क्यों इतना कष्ट देते हो खुद को ? क्यों नहीं करते हो खुद की जरा सी भी परवाह ? पता है आजकल मौसम बहुत सर्द है,दिन छोटे छोटे और रातें बहुत लंबी ,,कोहरे भरा आसमान एकदम से धुंधला जाता है ,,,मेरी आँखें उस समय तालाश रही होती हैं चाँद कि आँख बहने लगती हैं ,यह आँसू नहीं हैं प्रिय यह सब तो सर्द कोहरे के कारण हो रहा है ,,,नम आँखें यूं ही तो भरी भरी रहती हैं न ....यह सर्दियाँ न जाने क्...
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गतांक से आगे  जब तुम कुछ नहीं कहते तब कितना कहते हो  सुनती रहती हूँ मन लगाए तुम्हारी बातों को !! सुनो प्रिय,               तुम कहते हो तो कहते हो, कितनी ही बातें, तमाम बातें लेकिन जब तुम कुछ नहीं कहते तब भी तो कितनी ही बातें करते रहते हो मन से मन लगाकर और मैं उन बातों को सुनने में लगी रहती हूँ क्योंकि मुझे पसंद है तुम्हें सुनना, सुनो न मेरे प्रियतम तुम कहते रहो यूं ही और मैं सुनती रहूँ और गुजर जाएँ सदियाँ ....कई जन्म जन्मांतर ...मेरा सर कभी तुम्हारे कंधे पर हो और कभी तुम्हारा सर मेरी गोद में, नजरों में नजर डाले बैठे रहें कहते और सुनते हुए ,हाँ प्रिय सिर्फ तुम कहते रहो , मैं सिर्फ सुनना चाहती हूँ ,,,दिल कैसा सकूँ से भर जाएगा, न जाने तब बेकरारी कहाँ चली जाएगी ...पल पल का इंतजार कहीं गुम हो जाएगा ...खत्म हो जाएंगी इंतजार की घड़ियाँ ...हम साथ होंगे ...हम साथ साथ होंगे ....सुनो मेरे प्रीतम यह कैसा नशा है ,,,यह मेरे मन पर पहली बार तारी है कि जैसे मैं हवाओं में हूँ ...मैं घटाओं में हूँ ...मैं फिज़ाओं को चूमकर ख...
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  गतांक से आगे  बड़े अच्छे लगते हैं  ये धरती ये नदिया ये रैना और ????? और तुम ,,,,,,,, सुनो प्रिय,               यह सच है कि मुझे आजकल बहुत अच्छा लगता है मैं खुलकर मुस्करा देती हूँ मन में कोई उलझन भी नहीं है लेकिन जब कभी मैं बहुत गहराई में डूबकर तुम्हें सोचती हूँ तो न जाने क्यों मेरी आँखों में सिर्फ आँसू होते हैं और मैं  इस जिंदगी से घबरा जाती हूँ बेचैनी से भर जाती हूँ ,,,क्यों होता है ऐसा नहीं पता पर हमेशा ऐसा ही होता है ...न जाने कैसा रिश्ता सा बन गया है इन आंसुओं से कि यह हर पल में हर क्षण में मेरा साथ निभाए जा रहे हैं ,,,कभी कभी ऐसा महसूस होने लगता है कि अगर अपने इन आंसुओं और तुम्हारा कंपटीशन किया जाये तो जीत आंसुओं की हो जाएगी और तुम हार जाओगे ....तब मुझे तुम्हारा हारना अच्छा नहीं लगेगा बिलकुल भी नहीं ...तुम्हारी किसी भी तरह की हार हो लेकिन होगी तो हार ही न .....क्योंकि मैंने तो तुम्हें हमेशा जीतते हुए ही देखा है और तुम्हारा जीतना ही मुझे खुशी देता है ...तभी तो मैं बार बार हारकर भी तुम्हें जिता देती हूँ ...शायद तु...
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गतांक से आगे  लाली मेरे लाल की जीत देखूँ उत लाल  लाली देखन मैं चली मैं भी हो गयी लाल !! सुनो प्रिय,                दिल की धड़कने बढ़ जाती हैं ,,बढ़ी हुई ही हैं इन दिनों ... कितनी जल्दी दिन गुजर जाता है आजकल ,,कितनी जल्दी रात बीत जाती है... पहले तो एक पल भी सदी के समान लगता था लेकिन अब तो ऐसा लग रहा है जैसे समय के पंख लग गए हैं और वो कब फुर्र से निकल गया ,,,सच में सनम जब तुमसे बात करती हूँ मन खुशी से भरा रहता है इतनी खुशी कि मन झूमता ही रहता है,  अब तुम ही बताओ ऐसे में कहाँ पता चलेगा समय का ,,,, मन का एक एक तार खुद ब खुद सुलझता चला जाता है कोई उलझन ही नहीं ,कोई सुलझन ही नहीं ,,,बस इंतजार कि यह उँगलियों पर उल्टी गिनती गिनने भर के दिन रह गए हैं, तो समय भागता चला जा रहा है ,,,,प्रिय सच में मेरा मन बिलकुल ही दीवाना पागल है उसे कुछ और सूझता ही नहीं है सिर्फ तुम और सिर्फ तुम ,,,न तो यह समझने से समझता है, न कोई बात ही मानता है ,,बढ़ी हुई धड़कनों के साथ तुम्हारा नाम रटता रहता और इधर उधर तुम्हें तलाशता फिरता है जबकि मैं जानती हूँ तुम मेर...