गतांक से आगे
मन में न जाने कैसी हलचल सी है
न जाने यह कैसी सिहरन सी है रोम रोम में
न जाने कैसी घुटन सी
न जाने कैसी बेचैनी
ये कैसी उथल पुथल सी मची हुई है
जी चाहता है अपनी बाँहें फैलाऊँ और तुम्हें छु लूँ, भर लूँ अपनी बाँहों में और चूम लूँ तुम्हें ,प्रिय कि तुम्हारी याद आई , जी चाहता है इस तरह से सहेज लूँ तुम्हें कि कोई बुरी बला तुम्हारा बुरा न कर सके , प्रिय आ जाओ कि बाँहें फैला कर मैं तुम्हें पुकार रही हूँ,,,प्रिय तुम ही मेरी तकदीर हो और तुम्हारी मैं क्योंकि अलग नहीं है हमारी किस्मत वो अब साझी हो गयी है ,,,हाँ भरोसा है मुझे पूरा कि तुम हो मेरे ,,,मैं गाती रहूँगी,,,गुनगुनाती रहूँगी और तुम्हें यूं ही पुकारती रहूँगी क्योंकि आजकल मेरे मन में न जाने कैसी बेचैनी सी जाग गयी है जो मुझे पल भर का भी चैन ही नहीं लेने देती ,,,,मैं सुन रही हूँ ,,महसूस कर रही हूँ ,,,अहसासों में भर रही हूँ कि वो ऊंची पहड़िया ,,झरने ,मेरे स्वर में स्वर मिला रहे हैं ,,,मैं अपने प्रेम के उद्वेग में भरी न जाने क्या क्या कहे जाती हूँ ,,प्रिय ये मेरा प्रणय जो तुम्हें पुकारता है यह निरर्थक नहीं है ,यह सार्थक है प्रिय ,,,इन दिनो बेहद तीक्ष्ण वेदना भरी अनुभूति हो रही है ,जो मैं तुम्हें पुकार रही हूँ, हाँ प्रिय मैं अपनी बाँहें फैलाये तुम्हें पुकार रही हूँ और मेरे साथ साथ यह पूरी कायनात पुकार रही है ,,सुनो प्रिय क्या तुम्हें मेरी आवाज आ रही है ,,,तुम्हारे दिल तक मेरे दिल की पुकार पहुँच रही है ?
आ रे आ रे दिल पुकारे
प्रकृति ने भी स्वर मिला दिये हैं
प्रेम पुकार रहा है
अपनी सच्ची प्रवृति के साथ ,,,,
आ जाओ देर न करो
प्रिय अब देर न करो ...
खुशनुमा होकर ,,,,
क्रमशः
सीमा असीम
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