गतांक से आगे 
रिया मुस्करा



उदास शामों की सलवटें अक्सर अपना निशान छोड़ जाती हैं !
जाने क्यों कुछ शाम उदास होती हैं कुछ शामें उदास कर जाती हैं
सुनो प्रिय,
            न जाने क्यों मुस्कराते हुए भी अक्सर मन उदासियों में घिर जाता है और आँखों से अश्रु बहने लगते हैं थमते ही नहीं न जाने क्यों ऐसा हो जाता है ? न जाने क्यों मन जिद सी बांध लेता है किसी मासूम बच्चे की तरह कि बस तुम ही हो मेरे, सिर्फ तुम ,,,,न जाने मन के भीतर क्या पलता चला जा रहा है ....कभी जमता है, कभी पिघलता है, न जाने क्या है ? जो बेवजह आँखों को नम कर देता है,,, सुनो प्रिय, ये मेरा हँसते हँसते, मुस्कराते मुस्कराते हुए अचानक से रो देना,,, न जाने क्यों इतना दुखी हो जाता है दिल कि घबरा जाता है इस दुनियाँ के रीति रिवाजों से ,,,,तभी आ जाता है तुम्हारा ख्याल और मैं रोते रोते हुए भी मुस्कराने लगती हूँ प्रिय कि कहीं तुम भी उदासियों में न घिर जाओ ....प्रिय मेरा प्रेम बस यूं ही है लेकिन बहुत मासूम है, बहुत भोला है, बहुत नादान है कभी भी आजमा लेना है,,, ये पल में मान जाता है और तुम्हें अहसास भी नहीं होता कि मैं कब उदास होती हूँ ,, कब दुखी या कब निराश होती हूँ ,,सिर्फ इसलिए कि मैं देना चाहती हूँ तुम्हें खुशियाँ ,,वही तो आज तक देती आई हूँ और तुम शायद कभी सोच ही नहीं पाते मेरे किसी भी ख्याल के बारे में, तो भी क्या फर्क पड़ता है प्रिय लेकिन एक बात तुम हमेशा ही ध्यान रखना कि हम अपनी परिस्थितियाँ स्वयं ही बना लेते हैं न , तभी तो मैंने खुद को जकड़ लिया है बंधनों में बिना किसी चाह के, लेकिन मैं नहीं चाहती कि तुम मेरे बंधन में खुद को कमजोर महसूस करो ,,, तुम कमजोर हो ही नहीं सकते क्योंकि तुम हो प्रेम में ,,मेरे प्रेम में और प्रेम हमें कभी भी कमजोर नहीं बनाता ,,,
प्रिय तुम्हें याद है न जब तुम मुझे कभी डांट देते थे किसी बात पर नाराज होकर तो स्वयं ही अपनी गलती का अहसास करते थे क्योंकि किसी को दुख देना, दर्द देना प्रेम कैसे हो सकता है प्रिय तुम ही बताओ कैसे भला ,,,, मेरे प्रिय यह जो मेरा प्रेम है न इसके लिए रब से बस इतनी सी ही दुआ है कि हमें हमेशा यूं ही प्रेम में रहने देना ,,,यूं ही समर्पित भाव से मन में तृण मात्र का भी अहम न आने देना ,,,मुझे यूं ही अपने प्रिय की सासों में महकने देना ,,यूं ही उनके दिल में धड़कने देना ,,यूं ही उनकी रगो में बहने देना ,,यूं ही आँखों में बसने देना ,,,बिना किसी अपेक्षा या उपेक्षा के .,,,,


तेरी सांसों की ख़ुशबू से महकती हैं मेरी साँसें !
लब खामोश हैं मेरे औ बोलती हैं मेरी आँखें ! !

क्रमशः 
सीमा असीम

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