गतांक से आगे
रिया मुस्करा
छाप तिलक सब छीनी रे मोसे
नैना मिलायके, नैना मिलायके
सुनो प्रिय,
मैं सोचती हूँ , विचारती हूँ , याद करती हूँ , कि हमने मिलकर बुनी एक खूबसूरत सी चादर जिसे सजाया सुंदर सी रंग बिरंगी रंगों से सजी फुलकारी से ... ओढ़कर उसे खो जाते थे मनोहारी ख़यालों में ...हरपल में मैं उसे प्यार से सजाती सवांरती निहारती ॥कितनी चमक, कितनी खुशी आँखों से झरती रहती हमारी आँखों से ,,,कि न जाने कहाँ से भर गयी आँखों में ढेर सारी नमी, उदासी, दर्द, तकलीफ, जुदाई , विरह , तड़प इंतजार ॥सुनो मेरे रांझना आखिर क्यों ? हमने तो अपना सारा समय, तुम्हें ही समर्पित कर दिया ,,,दूर हो पास रहो फिर भीअपने पल पल में तुम्हें बसा लिया तो हमें तनहाई क्यों मिल गयी ? क्यों मिली ये सजा ? क्यों ???.... मेरे प्रिय मुझे फिर से जीना है, फिर से मिलना है, यही दुहाई मेरा दिल बार बार करता है ,,,,, न जाने कैसे यह दर्द से रिश्ता बन गया है ...न जाने कैसे लोग यह जुदाइयाँ सह पाते होंगे ...न जाने कैसे जी पाते होंगे ????
खुद से ही बेगानी होती जा रही हूँ कहीं खोती जा रही हूँ ...सुनो सनम ये मेरी हवा में फैली हुई बाहें गम को दूर करने को उतावली हो रही हैं ,,,,,पल पल में उन लम्हों में खोया मेरा मन ....दुनियाँ को भुला रहा है अपने साथ साथ ...
कि मैं अपने रांझना को अपने सीने में बसाये ढूंढ रही हूँ
जल रही हूँ, तप रही हूँ बार बार देख रही हूँ अपने हाथों की लकीरे चूमती हूँ और माथे से लगाकर एक दुआ कि मेरा साजन मुझे मिला दे ....प्रिय आओ चलें कि इंतजार कर रही हैं हमारा वो वादियाँ वो कायनात वो मौसम और वही हमारी प्रकृति ......
बादलों ने बहुत बारिश बरसाई
सर्द रातों में उठ -उठ कर
हमने तुझे आवाज़ लगाई
भीगी -भीगी हवाओ में
तेरी ख़ुशबू है समाई
तेरी याद आई
कि तेरी याद आई ...
क्रमशः
सीमा असीम
रिया मुस्करा
छाप तिलक सब छीनी रे मोसे
नैना मिलायके, नैना मिलायके
सुनो प्रिय,
मैं सोचती हूँ , विचारती हूँ , याद करती हूँ , कि हमने मिलकर बुनी एक खूबसूरत सी चादर जिसे सजाया सुंदर सी रंग बिरंगी रंगों से सजी फुलकारी से ... ओढ़कर उसे खो जाते थे मनोहारी ख़यालों में ...हरपल में मैं उसे प्यार से सजाती सवांरती निहारती ॥कितनी चमक, कितनी खुशी आँखों से झरती रहती हमारी आँखों से ,,,कि न जाने कहाँ से भर गयी आँखों में ढेर सारी नमी, उदासी, दर्द, तकलीफ, जुदाई , विरह , तड़प इंतजार ॥सुनो मेरे रांझना आखिर क्यों ? हमने तो अपना सारा समय, तुम्हें ही समर्पित कर दिया ,,,दूर हो पास रहो फिर भीअपने पल पल में तुम्हें बसा लिया तो हमें तनहाई क्यों मिल गयी ? क्यों मिली ये सजा ? क्यों ???.... मेरे प्रिय मुझे फिर से जीना है, फिर से मिलना है, यही दुहाई मेरा दिल बार बार करता है ,,,,, न जाने कैसे यह दर्द से रिश्ता बन गया है ...न जाने कैसे लोग यह जुदाइयाँ सह पाते होंगे ...न जाने कैसे जी पाते होंगे ????
खुद से ही बेगानी होती जा रही हूँ कहीं खोती जा रही हूँ ...सुनो सनम ये मेरी हवा में फैली हुई बाहें गम को दूर करने को उतावली हो रही हैं ,,,,,पल पल में उन लम्हों में खोया मेरा मन ....दुनियाँ को भुला रहा है अपने साथ साथ ...
कि मैं अपने रांझना को अपने सीने में बसाये ढूंढ रही हूँ
जल रही हूँ, तप रही हूँ बार बार देख रही हूँ अपने हाथों की लकीरे चूमती हूँ और माथे से लगाकर एक दुआ कि मेरा साजन मुझे मिला दे ....प्रिय आओ चलें कि इंतजार कर रही हैं हमारा वो वादियाँ वो कायनात वो मौसम और वही हमारी प्रकृति ......
बादलों ने बहुत बारिश बरसाई
सर्द रातों में उठ -उठ कर
हमने तुझे आवाज़ लगाई
भीगी -भीगी हवाओ में
तेरी ख़ुशबू है समाई
तेरी याद आई
कि तेरी याद आई ...
क्रमशः
सीमा असीम

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